बुधवार, 20 जनवरी 2010

"प्रकृति के रंग"

शाम ढल आई

मेघ की गहराई

नीर बन आई

आसमा की तन्हाई

न किसे भी नज़र आई ;


रातभर ऐसे बरसे मेघ

सींचा हर कोना व खेत

न जाना कोई ये भेद

किसने खेला है ये खेल ;


प्रभात में खिला उजला रूप

धुंध से निकली किरणों मे धूप

खेत में महका बसंत भरपूर

अम्बर आसमानी दिखा मगरूर ;



पंछियों से उड़े मतवाले पतंग

डोर को थामे मन मस्त मलंग

मुग्ध हूँ देख “प्रकृति के रंग”

कैसे भीगी रात की तरंग

ले आई है रश्मि की उमंग !!






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सु..मन 

"गया है पतझड़ आया है बसंत खिल गई सरसों उड़ी है पतंग" बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाए........


मंगलवार, 19 जनवरी 2010

कभी-कभी सोचती हूँ...........

जाने क्या है जाने क्या नहीं

बहुत है मगर फिर भी कुछ नहीं

तुम हो मै हूँ और ये धरा

फिर भी जी है भरा भरा

कभी जो सोचूँ तो ये पाऊँ

मन है बावरा कैसे समझाऊ

कि न मैं हूँ न हो तुम

बस कुछ है तन्हा सा गुम.......................!!

सु..मन 

शनिवार, 16 जनवरी 2010

अँधियारा सवेरा

उजली चादर ओढ़े

निकला नया सवेरा ;

पर अधखुली इन आँखों से

छटा नहीं था अभी अँधेरा ;

थोड़ी सी थी नमी

छाया था अभी कोहरा !




ये सुबह बीत कर

दोपहर में बदल गई ;

हज़ार कोशिशे नाकाम रही

अँधेरा लिपटा था मुझसे अभी ;

दिन भी बीत गया ऐसे

इसी कशमकश में शाम गई !



रात ने आकर अब

चान्दनी की आस लगाई ;

रेगिस्तान की तपती रेत की तरह

उसे मिलेगी ठंडक ये ठाठ बंधाई ;

पर अमावस्या की रात को

चाँद कहाँ निकलता है ;

बस अँधेरा ही अँधेरा

सबको समेटे चलता है !



रात तो आखिर रात ठहरी

सुबह का फिर इंतज़ार हुआ ;

पर आज का सवेरा भी

वैसा ही अँधियारा हुआ ;

अधखुली इन आँखों को

उजाले का न दीदार हुआ !



इसी कशमकश --२

दिन बीत कर रातों में बदले

महीनों के क्षण सालों में बदले

पर न बदला तो वो सवेरा

अँधियारा सवेरा

अँधियारा सवेरा !!




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सु..मन 

"जीवन राग"

जीवन राग की तान मस्तानी
समझे न ये मन अभिमानी ;


बंधता नित नव बन्धन में
करता क्रंदन फिर मन ही मन में ;


गिरता संभलता चोट खाता
बावरा मन चलता ही जाता ;


जिस्म से ये रूह के तार
कर देते जब मन को लाचार ;


होता तब इच्छाओं का अर्पण
मन पर ज्यूँ यथार्थ का पदार्पण ;


छंट जाता स्वप्निल कोहरा
दिखता जीवन का स्वरूप दोहरा ;


स्मरण है आती वो तान मस्तानी
न समझा था जिसे ये मन अभिमानी !!


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सु..मन