सोमवार, 22 मार्च 2010

क्यों ?







                                                                  

        





 क्यों ?



क्यों   न सोचना चाहते हुए भी
         सोचते जाते हैं लोग 
         दुनियां की भीड़ में
         तन्हाइयों में डूब जाते हैं लोग


क्यों   न मुस्कराना चाहते हुए भी
         छलकती आँखों से मुस्कराते हैं लोग
         गमों को छुपाकर
         अश्कों को पीये जाते हैं लोग


क्यों   न जीने की चाह होकर भी
         जिन्दगी जीये जाते हैं लोग
         सफर की मंजिल पर
         तन्हा रह जाते हैं लोग............?

20 टिप्‍पणियां:

  1. जिंदगी जिंदादिली का नाम है....अच्छी रचना..

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  2. .....न जीने की चाह होकर भी..ज़िन्दगी जीये जाते हैं लोग
    बहुत सुन्दर भावनाओं की अभिव्यक्ति....
    वैसे हौसला रखने के लिये ये शेर कितना बेहतरीन है-
    चला जाता हूं हंसता खेलता दौरे-हवादिस से
    अगर आसानियां हों, ज़िन्दगी दुश्वार हो जाये.

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  3. सुमन जी .....आपके क्यूँ का जबाब शायद वो अदृश्य शक्ति है जो हर दिल में गम बन के धडकती है ..बर्दाश्त नहीं होती तो कभी आंसू बन के टपकती है और फिर दे देती है हर टूटे दिल को एक नयी उर्जा एक नयी ठोकर खाने का हौसला शायद यही जीवन है जैसे बरसों से पड़ी सुखी घास जरा सी ओस की बूँद मिलते ही फिर नयी कोंपल बन कर फूट पड़ती है !
    बहुत सुंदर स्वाल......बहुत बहुत आभार

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  4. क्यूँ --- क्यूँ
    क्यूँ नही मिलते हमारे सवालो के जवाब
    क्यूँ
    सार्थक प्रश्न उठाया है आपने

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  5. क्यों .....क्यों .....क्यों.....!!

    इस क्यों का कोई जवाब नहीं है सुमन जी .....!!

    हमने तो सारी उम्मीदे रख ली हैं गठरी बांध
    जब आएगी मौत रख लेंगे गठरी भी साथ .....

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  6. क्यों? कलम के जरिये आँखों के रस्ते दिल में उतर जाते हैं लोग

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  7. आप हमेशा इतना ही अच्छा लिखती हैं क्या ?......
    ...........
    विलुप्त होती... नानी-दादी की बुझौअल, बुझौलिया, पहेलियाँ....बूझो तो जाने....
    .........
    http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_23.html
    लड्डू बोलता है ....इंजीनियर के दिल से....

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  8. वाकई, कुछ सवालो के जवाब नहीं होते । बहुत सुन्दर रचना ।

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  9. log jindgi ji nahi rahe kisi tarah kat rahe hai..ghasit rahe hai......kyuki uname sanse hai....dil bhi hai.....sochane ki khamata bhi hai ...sab kuchh hote hue bhi unke pass..sirf......jindgi jine ka andaj nahi hai.....isliye mere khayal se is tarah log jinagi ji nahi rahe..sahyad sirf kat rahe hai.......bas kat rahe hai.......

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  10. bahut khubsurat rachna aapki pehle ki trah ...badhai ho aap mere blogs par zarur aaya kijiye khushi hogi

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  11. बहुत खूब !!!
    कभी अजनबी सी, कभी जानी पहचानी सी, जिंदगी रोज मिलती है क़तरा-क़तरा…
    http://qatraqatra.yatishjain.com/

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  12. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  13. आपके किसी भी क्यूँ का जवाब नहीं ..
    लेकिन जो लिखा है उसका भी जवाब नहीं ...........लाजवाब

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  14. Pehli baar aapko padha hai...
    Sanjeedgi se ot-prot aapki yeh rachna aise sawaal poochhti hai jiske jawaab hain hi nahin!
    Kam se kam mujh phoohad aadmi ke paas to nahin!
    Khair, rachna pasand aayee!

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  15. एक संजीदा
    लेकिन भाव-पूर्ण रचना
    मन से मन का सवाल
    और जवाब भी
    भीतर ही कहीं..... !!

    अभिवादन .

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  16. bahut khoob.....mujhe bhi apne vicharon se abhibhut karein....http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  17. दुनिया की भीड़ में तन्हाइयों में डूब जाते हैं ...

    ये सच है ... इंसान अपने आप से ही तन्हा होना चाहता है ... और पूरी दुनिया से तन्हा हो जाते है ... कमाल का लिखती हैं आप ...

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