शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

अंतर्द्वन्द

                                 

                                            


                                      अन्दर जो पलता है , आँखों से बहता है ।

                           बेजुबान है मगर , फिर भी कुछ कहता है ।
                      
                                      नहीं रखता कोई बन्धन , पर जकड़े रखता है ।

                           मन की बातों को , खामोशी से तोलता रहता है ।
                      
                                      ये है ‘अंतर्द्वन्द’ , जो चुपचाप चलता रहता है !!

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

स्वप्निल राह

जीवन की राहों में कई बार कदम कुछ ऐसी राह पकड़ लेते हैं जिसकी कोई मंजिल नहीं होती या यूं कहो कि मंजिल सपना बन जाती है और वो राह स्वप्निल ।






स्वप्निल राह

जीवन की सच्चाई से
अनभिज्ञ वो
बढ़ती जा रही थी
स्वप्निल रास्तों के गांव
लेकर विचारों की छांव
कदम पर आई ठोकर को
विश्वास के पत्ते से सहलाती
बस बढ़ती जा रही थी
बेखौफ वो जज़्बाती
मंजिल से दूरी
लगती अब कम थी
आँखें भी खुशी से
हो गई नम थी
पर.....
एक पल में मानो
सब कुछ बिखर गया
तिनका-तिनका कर घरौंदा
अब तो टूट गया
उसकी ये राह
सिर्फ स्वप्निल थी
जीवन की सच्चाई नहीं
मन की भटकन थी
ये जानती है वो
ये जानती है वो
कि स्वप्निल राहों की
दिशाएं नहीं होती
गर न होता
ये नाजुक मन
न होते अरमान
न ही आशाएं होती
न होते अरमान  
                  न ही आशाएं होती ...............




                                 सु..मन 


बुधवार, 14 अप्रैल 2010

कुम्भ स्नान..............आस्था

                                       



आज कुम्भ का अंतिम शाही स्नान है1लाखों लोग गंगा स्नान के लिये गए हैं1ऐसे में एक कथा याद आ रही है जो मेरे पिता जी सुनाया करते हैं जिसमें छिपे गूड़ रहस्य को हम लोग जान नहीं पाते हैं1कथा कुछ इस तरह है.......
एक बार हरिद्वार में कुम्भ का मेला लगा था लाखों लोग वहां जा रहे थे1उस समय शिव पार्वती भ्रमण करते हुए बहां से गुजर रहे थे तो पार्वती जी ने कहा –हे भोले नाथ,कहते हैं की कुम्भ में सभी पाप धुल जाते हैं तो क्या ये सभी प्राणी पाप से मुक्त हो आपके धाम पहुंच जाएगें1शिव बोले-पार्वती ये पृथ्वी की माया बड़ी अजीब है इसे विषय को छोड़ दो 1परंतु पार्वती जी के हठ करने पर शिव पार्वती पृथ्वी लोक आ गए और एक दम्पती के रूप में हरिद्वार जाने वाले रास्ते में रुक गए1वहां पर दलदल थी इंसान के रूप में शिवजी उस दलदल में फंस गए और पार्वती किनारे पर खड़े हो कर आने जाने वालों से अपने पति को बाहर निकालने के लिये प्रार्थना करने लगी1जब लोग शिवजी को बाहर निकालने में मदद करने लगे तो पार्वती ने कहा- वही व्यक्ति हमारी मदद करें जिसने कोई पाप न किया हो1 ये सुनकर लोग पीछे हट जाते और कहते कि क्या कोई ऐसा भी इंसान होगा जिसने कोई पाप न किया होगा भूले से सही कुछ बूरे कर्म तो हो जाते हैं 1 ऐसे ही लोग आते जाते रहे 1अंत में एक डाकू वहां से गुजरा जो अभी अभी कुम्भ से लौटा था पार्वती जी ने उसे मदद करने को कहा साथ में अपनी शर्त भी बता दी तो डाकू ने कहा –यूं तो मैने अपने जीवन में अनेक पाप किये हैं पर गंगा में डुबकी लगाने से मेरे तन और मन दोनों की शुद्धि हो गई है उसके बाद मैने अब तक कोई पाप नहीं किया है और झट से वह शिवजी की मदद करने लगा उसी समय शिवजी अपने रूप में प्रकट हो गए और कहा- हे पार्वती, कुम्भ में तो अनगिनत लोगों ने स्नान किया पर सिर्फ यही एक मनुष्य मेरे धाम आयेगा 1यह पूरे विश्वास और भाव से गया था तभी तो इसके मन में कोई दुविधा नहीं थी1 चाहे जीवन में इसने अनेक बूरे कर्म किये हैं पर इस तरह का समर्पण ,श्रद्धा बाकी लोगों मे नहीं था वो स्नान करके अपने शरीर को तो धो आए थे पर मन अभी भी मलिन था1उस डाकू को आशीर्वाद देकर वे अपने धाम लौट गए 1

अंत में बस यही कहूंगी –मन चंगा तो घर विच गंगा

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

याद आता है.............

याद आता है.......


याद आता है
वो माँ का लोरी सुनाना
कल्पना के घोड़े पर
परियों के लोक ले जाना
चुपके से दबे पांव
नींद का आ जाना
सपनों की दुनियाँ में
बस खो जाना ...खो जाना...खो जाना..................

याद आता है
वो दोस्तों संग खेलना
झूले पर बैठ कर
हवा से बातें करना
कोमल उन्मुक्त मन में
इच्छाओं की उड़ान भरना
बस उड़ते जाना...उड़ते जाना...उड़ते जाना.............

याद आता है
वो यौवन का अल्हड़पन
सावन की फुहारें
वो महका बसंत
समेट लेना आँचल में
कई रुमानी ख़ाब
झूमना फिज़ाओं संग
बस झूमते जाना...झूमते जाना...झूमते जाना............

याद आता है
वो हर खुशनुमा पल
बस याद आता है..............
                           याद आता है.............
                                               याद आता है................!!



सु..मन 

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

तेरे बगैर ............

अहसास ,संवेदनाएं सिर्फ मानव हृदय में ही नहीं पनपती अपितू हर उस जगह में समा जाती है जिससे हम जुड़े होते हैं फिर चाहे वो हमारा घर हो या हर वो जगह जो हमसे जुड़ी हो 1संवेदनाएं सभी में हैं बात सिर्फ महसूस करने की है जुड़ाव की है 1जैसे हमें अनुभूति होती है अपने घर व किसी स्थान के प्रति वैसे ही ये तथाकथित निर्जीव चीजें हमारे प्रति संवेदनशील होती हैं 1जब किसी परिवार का सदस्य कहीं चला जाता है तो सबको उसकी कमी ख़लती है वैसे ही घर व उससे जुड़ी चीजें ,जगह भी उसकी कमी को महसूस करते हैं बस बयां नहीं कर पाते अपने अहसास को सिर्फ तकते रहते हैं निशब्द .........अनजान चेहरों को कि शायद कोई उनकी संवेदनाओं को पढ़ सके..........1कुछ समय पहले किसी के जाने से उस जगह के अधूरेपन को जाना मैनें , बस उसका हर कोना ये कहता महसूस होता था ......................







तेरे बगैर............


मेरे मेहरबां
मुड़ के देख ज़रा
कैसी बेज़ारी से
गुजरता है
मेरा हर लम्हा
तेरे बगैर.....................

तुम थे – 2
तो रोशन था
मेरे ज़र्रे-ज़र्रे में
सकूं का दिया
अब तू नहीं तो – 2
जलता है
मेरा हर कतरा
गम के दिये में
तेरे बगैर.........................


तुम थे – 2
तो महकती थी
तेरी खुशबू से
मेरी फुलवारी
अब तू नहीं तो – 2
सिमट गई है
मेरी हर डाली
यादों की परछाई में
तेरे बगैर....................


तुम थे तो मैं था – 2
मेरे होने का था
कुछ सबब
सींच कर अपने प्यार से
बनाया था ये महल
अब तू नहीं तो – 2
टूट कर बिखर गया हूँ
इक मकां सा बन गया हूँ
तेरे बगैर...............
तेरे बगैर...................


                                              सु..मन