शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2010

तेरे रंग में रंगने लगी है...............

तेरे रंग में रंगने लगी है...............


ऐ दोस्त,चल चलें साथ कुछ कदम
कि तन्हाई भी अब बातें करने लगी है

टूटने लगे हैं सब दायरे खामोशी के
कि आँखें भी अब तो बातें करने लगी है

दफ़न थे जो कुछ लफ़्ज अनकहे पन्नों में
कि कलम मेरी अब कुछ गुनगुनाने लगी है

सुकूं मेरे दिल को पहले भी था लेकिन
कि रूह से अब तेरी खुशबू महकने लगी है

ये वफा , ऐतबार हैं जो नज़राने दोस्ती के
कि जिंदगी अब इनकी चाहत करने लगी है

ऐ दोस्त, संभाले रखना ये ऐतबार मेरा
कि जिंदगी अब तेरे रंग में रंगने लगी है...............!!


                                                                                  सु..मन 

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

बेमानी सब..........













अपनों का अपनापन झूठा सा लगता है
क्या कहें क्यों सब बेमानी सा लगता है

था सच जो दिखावा सा लगता है
हर रिश्ता अब तो टूटता सा लगता है

धागा था विश्वास का उलझा सा लगता है
पड़ गई गांठ उसमे गुमां सा लगता है

चमकता था हमेशा वो चाँद झूठा लगता है
चाँदनी से भी अब खौफ सा लगता है

था बन्धन रिश्तों का धोखा सा लगता है
हर कड़ी का सिरा खुला सा लगता है

रिश्तों का हर पहलु बदला सा लगता है
खुद जिंदगी से अपनी डर सा लगता है

छोटा दायरा सोच का बढ़ा सा लगता है
तड़पने के सिवा नहीं काम कुछ लगता है

जिंदगी रह गई है इन सोचों के लिये शायद
कुछ कम कुछ ज्यादा सबब रहता है................!!


                                                                                                           

                                                                                      सु..मन