शनिवार, 20 नवंबर 2010

उसका गम

क्यों वो चेहरा धुन्धला सा


             नज़र आने लगा है हमें


अपना होते हुए भी


            बेगाना लगने लगा है हमें


क्यों बैठे ही बैठे


            कहीं   डूब   जाते    हैं    हम


ना होती किसी की चाहत


            ना    किसी    का      गम

बस एक झलक को उसकी


           तरस    जाते    हैं    हम


ये सोचते ही सोचते


          उसके गम डूब जाते हैं हम.............


 
                                                                                                                     सु..मन 

18 टिप्‍पणियां:

  1. इतना भी गम में डूबना अच्छा नहीं होता इस उम्र में...जल्दी उभर जाइये.अच्छी रचना. :)

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  2. यादों का प्रवाह बलात् ही ले जाता है, जाने कहाँ।

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  3. कभी कभी होता है ऐसा ... इसी को जीवन कहते हैं ... अच्छी भावनात्मक रचना ..

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  4. अनामिका जी......... मन जिस क्षण में जो सोचता है पन्नों पर उभर आता है......ये तो कवि की कल्पना है जो लफ्जों में उतर आती है.......

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  5. बेगानापन...धुंधलापन और झलक को तरस जाने के भाव जिस प्रकार पेश किए गए हैं, उससे रचना में नवीनता और विविधता नज़र आती है...
    बधाई.

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  6. कुछ नहीं , यह किसी से प्यार हो जाने की प्रथम अनुभूति है....

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  7. हम तो खैर डूब कर निकल आए हैं। काफी लंबे समय तक डूबना सेहत के लिए अच्छा नहीं है। क्या करें फितरत ही ऐसी है। जमाने में और भी गम है मोहब्बत के सिवा।

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  8. bahut barhiyaa hai.

    kyaa kitnaa is kavitaa mein achhaa hai,
    kyaa batlaayenge ham.
    khoobsoortee mein abhee doobaa man hai,
    phir bataayenge ham.

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  9. मन
    ग़म
    लफ्ज़
    और पन्नों
    की सांझेदारी...
    बहुत सुन्दर काव्य !!

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  10. मोहब्बत की कशमकश क्या कहिये..

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  11. kya khoob kaha hai ...

    shabd jaise bhaav me hi dhal gaye hai .. waah waah

    bahut sundar rachna

    badhayi

    vijay
    kavitao ke man se ...
    pls visit my blog - poemsofvijay.blogspot.com

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  12. प्यार मे ऐसा ही होता है। सुन्दर रचना के लिये बधाई।

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