शनिवार, 16 जनवरी 2010

अँधियारा सवेरा

उजली चादर ओढ़े

निकला नया सवेरा ;

पर अधखुली इन आँखों से

छटा नहीं था अभी अँधेरा ;

थोड़ी सी थी नमी

छाया था अभी कोहरा !




ये सुबह बीत कर

दोपहर में बदल गई ;

हज़ार कोशिशे नाकाम रही

अँधेरा लिपटा था मुझसे अभी ;

दिन भी बीत गया ऐसे

इसी कशमकश में शाम गई !



रात ने आकर अब

चान्दनी की आस लगाई ;

रेगिस्तान की तपती रेत की तरह

उसे मिलेगी ठंडक ये ठाठ बंधाई ;

पर अमावस्या की रात को

चाँद कहाँ निकलता है ;

बस अँधेरा ही अँधेरा

सबको समेटे चलता है !



रात तो आखिर रात ठहरी

सुबह का फिर इंतज़ार हुआ ;

पर आज का सवेरा भी

वैसा ही अँधियारा हुआ ;

अधखुली इन आँखों को

उजाले का न दीदार हुआ !



इसी कशमकश --२

दिन बीत कर रातों में बदले

महीनों के क्षण सालों में बदले

पर न बदला तो वो सवेरा

अँधियारा सवेरा

अँधियारा सवेरा !!




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सु..मन 

"जीवन राग"

जीवन राग की तान मस्तानी
समझे न ये मन अभिमानी ;


बंधता नित नव बन्धन में
करता क्रंदन फिर मन ही मन में ;


गिरता संभलता चोट खाता
बावरा मन चलता ही जाता ;


जिस्म से ये रूह के तार
कर देते जब मन को लाचार ;


होता तब इच्छाओं का अर्पण
मन पर ज्यूँ यथार्थ का पदार्पण ;


छंट जाता स्वप्निल कोहरा
दिखता जीवन का स्वरूप दोहरा ;


स्मरण है आती वो तान मस्तानी
न समझा था जिसे ये मन अभिमानी !!


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सु..मन