शनिवार, 4 सितंबर 2010

ज़ख्म










ज़ख्म

बन्द हैं चौखट के उस पार
अतीत की कोठरी में
पलों के रत्न जड़ित
आभूषण
एक दबी सी आहट
सुनाती
एक दीर्घ गूंज
समय चलता
अपनी उलटी चाल
घिरता कल्पनाओं का लोक
लम्हों को परिचालित करता
अपने अक्ष पर
प्रतिध्वनित हो उठती
अनछुई छुअन
सरिता बन जाता
समुद्र का ठहराव
हरित हो उठती
पतझड़ की डालियाँ
लघु चिंतन में
सिमट जाता
पूरा स्वरूप
बन जाता
फिर......
एक रेत का महल
खुशियों का लबादा ओढ़े
दस्तक देता प्रलय
ढेर बन गए महल में
दब जाती
वो गूंज
रत्नों पर फन फैलाए
समय का नाग
डस लेता
देता एक सुलगता ज़ख्म
रिसता है जो
शाम ढले
उस चौखट को देखकर..........!!

                                                               सु..मन