शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

तुम संग चलूँगी..........















तुम्हें याद है ना
मैं कहती थी तुमसे
जीवन के हर पथ पर
तुम संग चलूँगी......
तो तुम
मेरी इन आँखों में
गहरे उतर कर
बस हंस देते थे
( उस हंसी का अर्थ मैं आज समझ पाई हूँ )
और
फिर मुड़कर
देखने लगते
सूर्य के डूबने से
उभर आई लाली को
और मैं
बस तुम्हारे काँधे पर
सर रखकर
स्वप्निल राह पर
चलने लगती
तुम संग..........













फिर छूटे कुछ पत्ते
समय की डाली से
और बस रह गया
उस राह का धुंधलका
और
मेरी बोझिल आँखें
बहती हैं जिससे
अब
गर्त की बौझारें
उन्हें अपनी अंजुरी में
भर कर
चल देती हूँ
उसी धुंधली राह पर
अपनी अक्षय सोच लिए
कि
जीवन के हर पथ पर
तुम संग चलूँगी...........
तुम संग चलूँगी...........


                                  सुमन मीत



29 टिप्‍पणियां:

  1. शनिवार (१०-९-११) को आपकी कोई पोस्ट नयी-पुरानी हलचल पर है ...कृपया आमंत्रण स्वीकार करें ....और अपने अमूल्य विचार भी दें ..आभार.

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  2. इस भावपूरित कविता ने कई बार पढ़ने के मज़बूर किया।

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  3. भावों से ओत-प्रोत..दिल को छू लेने वाली रचना.

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  4. जय हो सुमन !
    बहुत ही अच्छी पंक्तियां
    "अपनी अक्षय सोच लिए"

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  5. तुमने संग चलने का वादा लिया भी , किया भी,
    मै चलता रहा ,तुम ठहरती रहीं,
    मै दिल-संग रहा,तुम संग-दिल हुईं...
    शायद ये मेरी मोहब्बत है..
    और वो ......

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  6. अंजुरी में भर कर ... बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति

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  7. सुन्दर शेली सुन्दर भावनाए क्या कहे शब्द नही है तारीफ के लिए .

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  8. गूढ़ भावार्थ लिए हुए...अति सुन्दर रचना!

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  9. बहुत सुंदर अहसास है सुमन जी ...और उस से भी बड़ी बात के अहसास को शब्द दे दीये आपने .... शब्दों के लिए धन्यवाद ...और शुभकामनायें !!!!

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  10. Tum sang chalungi............bahut hee acchi bani hai kya kahne aapke ...........

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  11. बहुत से वादे जज्बातों की याद करवाती खूबसूरत रचना |

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  12. बहुत अच्छा लगा तुमको पढ़ना ..... अब तो बस तुम्हारे ब्लाग की हर पोस्ट पर साथ चलूंगी :)

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