बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

ख़्वाब....हकीकत...या कोई ख़्याल




















वो तेरे प्यार की बातें
न होकर भी
मेरे हर पल में
तेरा होना
कभी अजीब सी बेरुखी
और खामोश हो जाना.......
कभी बाहों में भरकर
बेइंतहा प्यार करना
तो कभी अजनबी सा
मुझे तन्हा छोड़ देना....
वो तेरा
ख़्वाबों का आशियाना बनाना
और हमारे मासूम जज़्बातों को
उसमें सजाना
फिर खुद की आजमाइश में
सूनी डगर पर
अकेला निकल जाना....
क्या था !
समझ नहीं पाई
गर मिले तुम्हें फुरसत
चन्द लम्हों की
बता जाना मुझे
वो प्यार तेरा
क्या था
ख़्वाब...हकीकत...या कोई ख़्याल मेरा...........!!
                                 


                                       सुमन मीत


23 टिप्‍पणियां:

  1. Nice post.

    http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BUNIYAD/entry/%E0%A4%B2%E0%A4%A1-%E0%A4%A4-%E0%A4%B5%E0%A4%B9-%E0%A4%B9-%E0%A4%9C-%E0%A4%95-%E0%A4%A7%E0%A4%B0-%E0%A4%AE-%E0%A4%95-%E0%A4%A8%E0%A4%B9-%E0%A4%9C-%E0%A4%A8%E0%A4%A4

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  2. इस जज़्बे को न समझ कर चला जाने वाला ज़िन्दगी की दौड़ में कभी सफल नहीं हो पाता और जो हार जाता है जीत उसी के नाम होती है।

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  3. क्या कहा जाये वो क्या था भरम था या हवा था …………बहुत सुन्दर ख्याल संजोये हैं।

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  4. हकीकत ही हो.. यही कामना है...
    सुन्दर कृति...

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  5. बहुत ही बढ़िया।
    ----
    कल 14/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  6. बहुत सुन्दर
    शायद यह एहसास है ...

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  7. मन के भावों की सुंदर प्रेम पूर्ण प्रस्तुति , बधाई ।

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  8. प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो.
    सुंदर कृति.

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  9. ये समझना आसान तो नहीं होता ... प्रेम को समझना भी आसान कहाँ होता है ... कमाल की अभिव्यक्ति है ..

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