मंगलवार, 15 नवंबर 2011

दर्द










 ... कुछ रोज पहले ही
जिया था मैंने तुझको
अपनी साँसों को कर दिया था
नाम तेरे
मेरा दिल धड़कने लगा था
तेरी ही धड़कनों से
कर ही दिए थे बन्द
सभी दर-ओ-दीवार बेजारी के
बस तेरी ही महक से
कर लिया था सरोबार
वजूद अपना ।

जिस्म से उठती थी
इक खुशबू सौंधी सी
जो करा देती थी
तेरे होने का एहसास
हर बार-हर पल मुझको ।

हुआ यूँ भी
गए रोज ;
तड़पती रही साँसे
तेरी महक के लिए
धड़कनों के लिए
तरसती रहीं धड़कने मेरी |


इस बीच
न जाने कब से

आने लगी मौत
दबे पाँव करीब मेरे
बन गए हैं जिस्म पर
कुछ अनचाहे जख्म
रिसने लगी है
ड़वाहट हमारे रिश्ते की
जो कभी घुलती थी
सबाबन मेरे जिस्म-ओ-जाँ में |


अब तो तैरते हैं
आँखों में 

गम के खारे बादल
जो बना ही लेते हैं राह
बरसने के लिए
रात की तन्हाई में
और फिर खामोश आँखें
पत्थरा जाती है
झरती हैं रात-रात भर
निर्झर..........

                             
                                    सु..मन 

24 टिप्‍पणियां:

  1. दर्द से झरती ...झर-झर....
    मर्मस्पर्शी रचना ....

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  2. कविता में बहता हुआ दर्द ... अच्छी प्रस्तुति

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  3. मन को छू गई ये रचना
    बहुत सुंदर,क्या कहने
    शुभकामनाएं

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  4. आँसुओं को बचा कर रखें, सृजन में सहायक होंगे।

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  5. आपकी अनुपम प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत
    आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  6. जिस्म से उठती थी
    इक खुशबू सौंधी सी...
    जो करा देती थी...
    तेरे होने का एहसास
    हर बार पल हर पल मुखको
    बहुत खूब...उम्दा रचना
    सुमन जी बधाई.
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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  7. गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार रचना लिखा है आपने ! उम्दा प्रस्तुती!
    मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  8. दर्द भरी सुंदर रचना,...मेरे पोस्ट 'शब्द'में आपका इंतजार है,...

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  9. मन का दर्द बस मन ही जाने..!
    --
    सुमन जी,
    आपको जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई !!

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  10. सोंचने को मजबूर करती रचना ...
    शुभकामनायें आपको !

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  11. pathraai aankhen hi baras paen to isse badhkar dard aur kya hoga....

    shirshak ko saarthak karti behatreen abhivyakti....

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  12. अब तो तैरते हैं
    आँखों में
    गम के खारे बादल
    जो बना ही लेते हैं राह
    बरसने के लिए
    रात की तन्हाई में
    और फिर खामोश आँखें
    पत्थरा जाती है
    झरती हैं रात-रात भर
    निर्झर..........

    behatar abhivyakti ...badhai Suman ji

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