बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

ख़्वाब....हकीकत...या कोई ख़्याल




















वो तेरे प्यार की बातें
न होकर भी
मेरे हर पल में
तेरा होना
कभी अजीब सी बेरुखी
और खामोश हो जाना.......
कभी बाहों में भरकर
बेइंतहा प्यार करना
तो कभी अजनबी सा
मुझे तन्हा छोड़ देना....
वो तेरा
ख़्वाबों का आशियाना बनाना
और हमारे मासूम जज़्बातों को
उसमें सजाना
फिर खुद की आजमाइश में
सूनी डगर पर
अकेला निकल जाना....
क्या था !
समझ नहीं पाई
गर मिले तुम्हें फुरसत
चन्द लम्हों की
बता जाना मुझे
वो प्यार तेरा
क्या था
ख़्वाब...हकीकत...या कोई ख़्याल मेरा...........!!
                                 


                                       सुमन मीत