बुधवार, 25 अप्रैल 2012

रात सिसकती है अब तन्हा , दिन अश्क बहाता जाता है














रात  सिसकती है  अब तन्हा , दिन  अश्क  बहाता  जाता  है

वक्त मांगे  अब  रिहाई मुझसे , भीतर  कुछ  सालता  जाता है
चले  थे  जानिब  दो  कदम , क्यूँ  रस्ता धुंधलाता  जाता है

कलम  नहीं  देती साथ  मेरा , हर्फ़ भी दामन छुड़ाता जाता है
अहसास का वो हर इक लम्हा , इक टीस बन तड़पता जाता है

बज्म-ए-सेहरा अब हस्ती मेरी , हर  शक्स रुख बदलता जाता है
जिस्म  ढोता है अब  जिंदगी , रूह में नश्तर सा चुभता जाता है

आँखें पथरा  गई इंतजार  में , यूँ ही आज कल में बीतता जाता है
कब आओगे तुम इस जानिब , कि दिल  अब  डूबता  जाता है

रात  सिसकती है  अब तन्हा , दिन  अश्क   बहाता  जाता है







सु ..मन 

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

सीले से लफ्ज़





















यूँ ही दरवाजे पे 
दी दस्तक
कुछ बीते लम्हों ने 
खोला .....तो देखा 
कुछ सीले सीले से लफ्ज़ 
मेहमां बनकर 
खड़े हैं सामने मेरे 
समेट कर हथेली पर 
ले आई मैं उनको अन्दर 
तेरी याद के सरहाने रख दिया है अब उनको भी.......!!