बुधवार, 25 अप्रैल 2012

रात सिसकती है अब तन्हा , दिन अश्क बहाता जाता है














रात  सिसकती है  अब तन्हा , दिन  अश्क  बहाता  जाता  है

वक्त मांगे  अब  रिहाई मुझसे , भीतर  कुछ  सालता  जाता है
चले  थे  जानिब  दो  कदम , क्यूँ  रस्ता धुंधलाता  जाता है

कलम  नहीं  देती साथ  मेरा , हर्फ़ भी दामन छुड़ाता जाता है
अहसास का वो हर इक लम्हा , इक टीस बन तड़पता जाता है

बज्म-ए-सेहरा अब हस्ती मेरी , हर  शक्स रुख बदलता जाता है
जिस्म  ढोता है अब  जिंदगी , रूह में नश्तर सा चुभता जाता है

आँखें पथरा  गई इंतजार  में , यूँ ही आज कल में बीतता जाता है
कब आओगे तुम इस जानिब , कि दिल  अब  डूबता  जाता है

रात  सिसकती है  अब तन्हा , दिन  अश्क   बहाता  जाता है







सु ..मन 

25 टिप्‍पणियां:

  1. मन के दर्द को आपने बेहद सशक्त अभिव्यक्ति दी है।

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  2. ऐसी सूरत चांदनी की.
    नींद उड़ जाये सभी की.

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  3. रात का गहरापन अकेलेपन से कम स्याह होता है।

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  4. बहुत ही सुन्दर और गाने योग्य रचना लिखी है आपने!
    बधाई हो!

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  5. मन के भावों को बहुत सुन्दर शब्दों में ढाला है आपने!...सुन्दर!

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  6. सुमन जी,
    आपने बहुत सशक्त रचना की है.. रात, तन्हाई, अश्क... बहुत सुंदर..
    अभिव्यक्ति में भी गहराई नज़र आती हैं.. बधाई

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  7. दर्दभरी प्रस्तुति ………बहुत सुन्दर

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  8. दर्द ही दर्द ... खूबसूरती से काही अपनी बात ...

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  9. भाव-विभोर करती आपकी खुबसूरत रचना.....

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  10. बहुत सुन्दर .......आँखे पथरा गयी इंतज़ार में.......!!

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  11. आपकी रचना बहुत खूबसूरत है ... लेकिन अगर आप बुरा न मानें तो मैं कुछ कहना चाहती हूँ ... आपने एक पंक्ति लिखी है .. "कब आओगे तुम ऐ जानिब " ... 'जानिब' शब्द का अर्थ 'तरफ' होता है .. 'ऐ जानिब' की जगह अगर आप 'इस जानिब ' कहना चाहते है तो ठीक है ... माफ़ी चाहूंगी अगर ज्यादा कह गयी तो ...

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  12. bahut bahut shukriya kshitiza ji ...bura man'ne ki koi bat nahi hai ..mujhe bahut achchha lga aapne mujhe galti ke bare me bataya.....durust kar liya maine ...aage bhi aapka margdarshan chahungi ...

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