रविवार, 13 मई 2012

दर्द





















दर्द अब पत्थर हो गया है
आँखें वीरान पथरीली जमीन

अहसास इकहरे ही घूमते रहते हैं
इस छोर से उस छोर
अपने अस्तित्व की तलाश में...

लहू तेजाब सा रगों में बावस्ता है
दिल झुलस रहा आहिस्ता-आहिस्ता
जख्म से नासूर बनने तक...

जाने कितनी साँस बाकी है अभी
जाने और कितना दर्द पत्थर होने को है...!!  




सु-मन



16 टिप्‍पणियां:

  1. अत्यंत संवेदनशील प्रस्तुति. दर्द के आगे ही जीत है....

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  2. आह ! दर्द की मार्मिक अभिव्यक्ति।

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  3. दर्द पत्थर सा, अहसास इकहरा, लहू तेज़ाब सा -- कुछ ऐसे सर्वथा नवीन बिम्ब हैं जो मन की वेदना को साकार कर रहे हैं।

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  4. सुना है दर्द जब हद से गुज़र जाता है तो खुद ब खुद दवा बन जाता है !

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  5. .

    कितना दर्द पत्थर होने को है …
    आहऽऽ… बहुत भावपूर्ण कविता !
    सुमन जी
    पिछली न पढ़ी हुई रचनाएं भी पढ़ कर जा रहा हूं …
    सबके लिए आभार-साधुवाद !


    हार्दिक शुभकामनाओं-मंगलकामनाओं सहित…
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  6. बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  7. हृदय की गहरी पीड़ा शब्द बनकर उतर आयी।

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  8. मौन कराह से भरी ....गहरे दर्द की अनुभूति देती आपकी रचना .....
    छू गाई मन को ...
    शुभकामनायें ....!!

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  9. बहुत खूब

    दर्द .. शायद बेदर्द है

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  10. दर्द की गहरी अनुभूति लिए ...
    बेचैनी सी झलक जाती है रचना से ...

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