गुरुवार, 12 जुलाई 2012

अब के सावन






















सोचा था
अब के
सावन का नज़ारा
कुछ और होगा
इस बारिश की
नन्ही बूंदों से
खेलूंगी मैं ....
इन पर्वतों पर
मचलते बादलों संग
झूमूंगी मैं ...
तेरे अहसास को
अपनी बाहों में भर कर
सरोबर कर दूंगी
खुद को
सावन की फुहार से
और
इन चंद पलों में
जी लूंगी मैं..जिंदगी
पर ...
ये सावन की नन्ही बूँदें
दर्द का अथाह सागर
ले आई हैं
और
टूटन के भंवर में
घिरकर
मेरे जिस्म का
कतरा-कतरा
मिल रहा है
धीरे-धीरे
इस दर्द के सागर में
और
एक क्षण
बन जाउंगी
मैं भी
इस सागर की
बूँद कोई ....!!



सु-मन

22 टिप्‍पणियां:

  1. सागर में मिलना तो तय है नदी का ... उस हर दर्द को सागर अपने में समोह लेगा समय आने पे ...
    अभी तो बूँद कों समेटने का समय है ... खेलने का समय है उनके साथ ...

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  2. जब सुन्दर सपने टूट कर चूर चूर हो जाते है...तब दिल पर जो गुजरती है!...बहुत सुन्दर रचना!

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  3. ये सावन की नन्हीं बूँदें....

    बहुत सुंदर रचना

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  4. मन की टूटन को कहती भावपूर्ण अभिव्यक्ति....

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  5. this one is like "a poem worth million words"!!!
    You told a story so easily....

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  6. उम्मीद पीछे छूट जाती हैं तो भारी दुःख होता है... भावपूर्ण रचना

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  7. दिल को छू गयी रचना...
    उत्कृष्ट अभिव्यक्ति.

    अनु

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  8. भावमय करते शब्‍द ... उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति।

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  9. बूंदों में छिपे मन के कितने ही रुदन भरे एहसास |

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  10. सावन की बूँदें हृदय नम कर जाती हैं।

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  11. ह्रदय की पीड़ा घुल मिल गयी है बूंदों में ...
    बहुत सुन्दर रचना ...!!
    शुभकामनायें सुमन जी ...!!

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  12. बहुत दर्द भरा है कविता में ।उसकी अभिव्यक्ति में मैं खो सी गई ।

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  13. बहुत ही भावपूर्ण रचना..
    प्रेम के दर्द और उसकी गहराई को समेटे...
    एकदम दिल को छू लेनेवाली..

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