गुरुवार, 12 जुलाई 2012

अब के सावन






















सोचा था
अब के
सावन का नज़ारा
कुछ और होगा
इस बारिश की
नन्ही बूंदों से
खेलूंगी मैं ....
इन पर्वतों पर
मचलते बादलों संग
झूमूंगी मैं ...
तेरे अहसास को
अपनी बाहों में भर कर
सरोबर कर दूंगी
खुद को
सावन की फुहार से
और
इन चंद पलों में
जी लूंगी मैं..जिंदगी
पर ...
ये सावन की नन्ही बूँदें
दर्द का अथाह सागर
ले आई हैं
और
टूटन के भंवर में
घिरकर
मेरे जिस्म का
कतरा-कतरा
मिल रहा है
धीरे-धीरे
इस दर्द के सागर में
और
एक क्षण
बन जाउंगी
मैं भी
इस सागर की
बूँद कोई ....!!



सु-मन