शनिवार, 9 नवंबर 2013

ऐ मीत ! तुम याद आ रहे हो ..














है वो ही मौसम
वही सज़र .. वही शाम
ऐ मीत ! तुम याद आ रहे हो .. 

है वो ही शाम की लाली 
नदी का ठहरा पानी  
वही किनारा और मैं
ऐ मीत ! तुम याद आ रहे हो ..

है वो ही प्यार की गहराई
एक साथ बुने सपने
वही सोच और मैं
ऐ मीत ! तुम याद आ रहे हो ..

है वो ही ये मेरी हथेली
तुम्हारा कोमल निर्मल स्पर्श
वही एहसास और मैं
ऐ मीत ! तुम याद आ रहे हो ..

है वो ही मौसम
वही सज़र .. वही शाम
ऐ मीत ! तुम याद आ रहे हो ..
             तुम याद आ रहे हो ........!!




सु..मन 



25 टिप्‍पणियां:

  1. आजकल मन अक्सर जब अकेला होता है
    तो दिल के एक जिन्दा बचे कोने मे सहेज कर रखे
    तेरी यादों के टुकड़े निकाल लेता है
    और आँखों की चादर बिछाकर उस पर टुकड़ा टुकड़ा सजाता है,
    पर अब पहले सी तेरी तस्वीर नहीं बनती
    अक्स तो फिर भी तुझसे मिलता जुलता है
    तासीर नहीं मिलती।

    -पुलस्त्य



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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (10-11-2013) को सत्यमेव जयते’" (चर्चामंच : चर्चा अंक : 1425) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सुंदर ... रूमानियत के उपालंभ

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  4. है वो ही ये मेरी हथेली
    तुम्हारा कोमल निर्मल स्पर्श
    वही एहसास और मैं
    ऐ मीत ! तुम याद आ रहे हो ..बेहतरीन !!

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  5. वाह मितवा ! क्या लिखा है सचमुच आनंद आ गया

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  6. ए मीत तुम याद आ रहे हो---
    भावपूर्ण रचना

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  7. बहुत सुंदर भावनात्मक संप्रेषण बधाई आपको ।

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  8. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

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  9. प्रकृति और प्रेम का एक अनूठा संगम है। प्रकृति से तन्मय आर्त्र प्रेम की उत्कंठा अक्सर कविता को जन्म देती है। बेहद सुन्दर प्रेम के आलम्बन में गुंथी प्रणय के विरह को उदीप्त करती पंक्तियाँ। साधुवाद सुमन जी।

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