शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

शब्द


शब्द, शब्दों में तलाशते हैं मुझे
और मैं ...उन शब्दों में तुम्हें !

रात जर्द पत्ते सी शबनम को टटोलती
चाँद जुगनू सा मंद मंद बुझा सा
नदी खामोश किनारों को सहलाती हुई
तब दूर कहीं सन्नाटे के जंगल में
सुनाई देता है मुझे दबा सा
कुछ अनकहे अनसुने शब्दों का शोर
धूमिल सी अधकच्चे विचारों की पगडंडी
उस शोर की तरफ बढ़ते अनथक दो कदम
कदम, कदमों में थामते हैं मुझे
और मैं...उन क़दमों में तुम्हे !

शब्द, शब्दों में तलाशते हैं मुझे
और मैं ...उन शब्दों में तुम्हें !!

सु-मन

(Special thanks to Manuj for giving his voice to my words)