मंगलवार, 24 जून 2014

दुख - सुख















बीत जाने पर
नहीं रहता दुख , दुख सा
मिटटी हो जाता है
उपजाऊपन से भरा
जिसमें रोपा जाता है
सुख का बीज |

जानते हो !
कैसे ?
ज्यूँ डाली टूट जाने पर
नहीं रहता जब उसका वजूद
पत्ते सूखकर
बिखर जाते हैं राह पर
तब उस राह से गुजरते हुए
समेट लेता है उनको कोई
जला लेता है अलाव
तो जानते हो
उन पत्तों की टूटन का दर्द
दवा बन जाता है
डाली से बिछोह का दुख
तब दुख नहीं रहता
अलाव में जलकर भस्म हो जाता है
होती है उसे सुख की अनुभूति
राख हो जाने के बाद |

दरअसल
हर दुख के धरातल पर
पड़ती है आने वाले सुख की नींव
और
हर सुख के बिछोने पर
जन्मता है आने वाले सुख का अंश !!

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सु..मन
( एक दर्द की याद में ...एक बरस बीत जाने पर ) 

शुक्रवार, 6 जून 2014

ये एक गरम दिन था











ये एक गरम दिन था
जिसमें सूरज ने उड़ेल दिया
अपना सम्पूर्ण प्रेम
और धरा
उस प्रेम में तप कर
निर्वाक जलाती रही खुद को
आँख मिचे |

ये एक गरम दिन था
जिसमें नदी खुद पीती रही
अपना पानी
किनारे की रेत
प्रेम की प्यास में जलकर
अतृप्त शिलाओं के बाहुपाश में
देखते रही इकहरी होती नदी को
टकटकी लगाए |

ये एक गरम दिन था
जिसमें हरे वृक्ष पड़े थे
औंधे मुँह
मक्की बीजे खलिहानों में  
अंकुर ले रहा था
नवजीवन की अनमोल साँसें
पवन चक्की मांग रही थी
हिमालय से अपने हिस्से की
कुछ हवा |

ये एक गरम दिन था
जिसमें जीवन था..अनगिनत साँसें थी !!


सु..मन 

सोमवार, 2 जून 2014

बेआवाज़ ख़ामोशी











सब ख़ामोश है अब
लफ्ज़ भी
एहसास भी
बंद किताब की तरह .....

ख़ामोशी की सिलवटें
बढ़ रही
हर पन्ने पर
आहिस्ता-आहिस्ता......

बीच-
अब कुछ भी नहीं
सिवाय  
बेआवाज़ ख़ामोशी के......

हाँ, बेढब यादें जिल्द सी
अब तक किताब को समेटे है शायद !!


सु..मन