मंगलवार, 24 जून 2014

दुख - सुख















बीत जाने पर
नहीं रहता दुख , दुख सा
मिटटी हो जाता है
उपजाऊपन से भरा
जिसमें रोपा जाता है
सुख का बीज |

जानते हो !
कैसे ?
ज्यूँ डाली टूट जाने पर
नहीं रहता जब उसका वजूद
पत्ते सूखकर
बिखर जाते हैं राह पर
तब उस राह से गुजरते हुए
समेट लेता है उनको कोई
जला लेता है अलाव
तो जानते हो
उन पत्तों की टूटन का दर्द
दवा बन जाता है
डाली से बिछोह का दुख
तब दुख नहीं रहता
अलाव में जलकर भस्म हो जाता है
होती है उसे सुख की अनुभूति
राख हो जाने के बाद |

दरअसल
हर दुख के धरातल पर
पड़ती है आने वाले सुख की नींव
और
हर सुख के बिछोने पर
जन्मता है आने वाले सुख का अंश !!

*************

सु..मन
( एक दर्द की याद में ...एक बरस बीत जाने पर ) 

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  2. बीत जाने के बाद - एक नई सुबह होती है नई सीख के साथ

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. आपकी पोस्ट को ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - पुण्यतिथि श्री श्रद्धाराम फिल्लौरी में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  5. बहुत गहन चिन्तन..पर सब कुछ कह कर भी सब अनकहा रह जाता है..

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  6. दुःख की बुनियाद पर सुख टिका है...दूसरों को सुख देने का प्रयास...अपने दुःख को कम कर देता है...सुन्दर रचना...

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