बुधवार, 23 जुलाई 2014

उसने कहा था












उसने कहा था 

बुत के समान 
जिन्दा लाश बनकर 
कब तक ढोते रहोगे 
जिंदगी का कफ़न 
आओ !
जड़ को चेतन में बदल कर 
फूलों के जहाँ में 
जीना सीखा दूँ 
चलो ! 
मरीचिका के आईने को 
पार कर देखो 
दर्पण के पहलू में 
अनेक बिम्ब दीखते हैं 
संभल कर पोंछ दो 
गर्द की परत 
निखर आयेगी हर छवि 
अंतस की गहराई में 
करो और देखो 
जिंदगी के दामन में 
हज़ारों रंग बिखरे हैं 
तुम्हारे लिए ..!!


सु-मन 

31 टिप्‍पणियां:

  1. भरपूर जिंदगी है इस रचना में !
    सकारात्मक सोच की कविता !

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    1. शुक्रिया वाणी mam ..मुझे ख़ुशी है कि आपने इस रचना को पूर्ण रूप से जाना ...

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  2. वाह बहुत ही सुन्दर शब्दानुभूति

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  3. उत्तर
    1. हंजी ..बहुत समय बाद सकारात्मक लिखा मैंने ...

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  4. जड़ को चेतन में बदल कर फूलों के जहां में जीना सिखा दूँ .....
    संभल कर पोंछ दो गर्द की परत ..... बहुत खूब @सुमन
    ज़िन्दगी के हसीं रुख को जो देखें कभी .....ग़म खुद किनारा कर लेते हैं .........पूनम

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  5. कल 25/जुलाई /2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  6. suman shukriya bahut dino baad aayi aap mere blog par bahut acchha laga.

    tumhara lekhan sada hi kheenchta hai mujhe . sunder.

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  7. नमस्ते अनामिका जी ...वो व्यस्तता के कारण आजकल कम समय मिलता है ...पर मुझे भी आपका लेखन लुभाता रहा है ...आते जाते रहेंगे अब ..भले ही बहुत दिन बाद सही :)

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