शनिवार, 30 अगस्त 2014

तुम्हारी चाहना
















मैंने एक चाह भर की
कि आज रात तुम ना निकलो
मैं खुली खिड़की से निहारूं राह
पर तुम ना आओ
अजीब सी शै है तुम्हारी चाहना
एक अनबुझ प्यास |

बाहर बारिश की बूंदों ने
कुछ आस बंधाई है
आज रात तुम
बादलों के पीछे छिप जाना
धुल जाये जब सुबह तलक
कलंक का ठीका
मेरी खिड़की तले
बिखेर देना तुम हल्की चाँदनी |
***
कलंक चौथ एक आस्था ...गणेश चतुर्थी एक उत्सव ..सब मन का फेर है...तुम्हारी चाहना इससे इतर कुछ भी नहीं !!

सु-मन


बुधवार, 27 अगस्त 2014

मुहब्बत का समीकरण









मुहब्बत पक्का ना थी
कभी कुछ गम
जमा हो जाता
कभी इकरार की हदें
नफ़ी हो जाती
कभी बेहिसाब मिलन के पलों को
गुणा कर
विरह के दिनों से
विभाजित कर देते
पर हल में जो भी शेष बचता
मुझे सिर्फ़ हमारा होने का सकूं देता...

हाँ , मुझे प्रिय है
हमारी मुहब्बत का ये समीकरण !!



सु-मन 

शनिवार, 23 अगस्त 2014

पूरे से ज़रा सा कम है ..













बारहा हुआ यूँ कि 
ज़ेहन में दबे लफ्ज़ 
निकाल दूँ बाहर 
खाली कर दूँ 
भीतर सब 
रूह पर पड़े बोझ को 
कर दूँ कुछ हल्का 
लिखूं वो सब अनचिन्हा 
जो नहीं चिन्हित कहीं और 
सिवाय इस मन के 

...पर 
हर बार 
लिखे जाने से पहले और बाद के अंतराल में  
लौट आते हैं कुछ लफ्ज़ 
सतह को छूकर , बेरंग से  
बैठ जाते हैं आकर 
मन के  उसी कोने में चुपचाप 

यूँ तो पन्नों पर 
पसर जाती है एक पूरी नज़्म 
फिर भी 
कलम तलाशती रहती है 
उन ख़ामोश लफ्ज़ों को 
मन टटोलता रहता है 
कुछ पूरा ..वो अनचिन्हा !!

(अधूरा कुछ भी नहीं ..जो कुछ है उसका होना है ..उसका घटित होना ...पूरा या अधूरा नामालूम किस घड़ी मन में चिन्हित हुए ...मालूम है तो बस इतना कि पूरे से ज़रा सा कम है ...)


सु-मन 




शनिवार, 9 अगस्त 2014

भैया सुनो !

Bhaiyu आपके लिए 










भैया सुनो !
नहीं जानती
कि क्यूँ कर
शुरू हुआ होगा
ये रक्षा बन्धन
कब,किस वजह से
बाँधी होगी किसी बहन ने
अपने भाई की कलाई पर
पहली राखी |

जानती हूँ
तो बस इतना
कि कच्चे धागे की डोरी को
बुना है मैंने
विश्वास के ताने बाने से
लगाए हैं इसमें  
अपने एहसास के रंग
और बांध दी है
तुम्हारी लम्बी उम्र की
गुढी गाँठ |

बदले इसके
नहीं मांगती कुछ
सिवाए इसके
कि ता-उम्र सम्भाले रखना
ये पवित्र बन्धन
मेरी ‘राखी’ को ना होने देना तुम राख !!


तुम्हारी बहन
सु-मन
(मेरी इस रचना को राजस्थान की Daily News अखबार के 'खुशबू' अंक में प्रकाशित करने के लिए वर्षा मिर्ज़ा जी का बहुत बहुत आभार)

सोमवार, 4 अगस्त 2014

बाबुल..तेरे जाने के बाद

(आज पापा को विदा किए दो बरस हो गए ...ऐ बाबुल ! बहुत याद आता है तू ..)










बाबुल !
मौन हैं ये क्षण
पर भीतर
अंतर्द्वन्द गहरा
फैल रही
मानसपटल पर
सारी समृतियाँ
झर रहे हैं वो पल
आँखों से निर्झर
चल दिए थे
जब तुम
निर्वात यात्रा
छोड़ सारे बन्धन
... बीते दो बरस
माँ भी बदल गई
दिखती है उम्रदराज
हंस देती है बस
बच्चों की चुहल से
वैसे रहती है
चुपचाप |

देखो ! उस कोने में
बीजा था जो तुमने
प्यार का बीज
अब हरा हो गया है
एक डाली से
निकल आई हैं
और तीन डालियाँ
खिलते है सब मौसम
उसमें तेरे नेह के
अनगिनत 'सुमन'
माँ सींचती है उनको  
अपने हाथों से
करती है हिफाज़त
हर आँधी से
यही है उसके
जीने का सामान  
यही तेरी निशानी भी है !!



सु-मन