शनिवार, 23 अगस्त 2014

पूरे से ज़रा सा कम है ..













बारहा हुआ यूँ कि 
ज़ेहन में दबे लफ्ज़ 
निकाल दूँ बाहर 
खाली कर दूँ 
भीतर सब 
रूह पर पड़े बोझ को 
कर दूँ कुछ हल्का 
लिखूं वो सब अनचिन्हा 
जो नहीं चिन्हित कहीं और 
सिवाय इस मन के 

...पर 
हर बार 
लिखे जाने से पहले और बाद के अंतराल में  
लौट आते हैं कुछ लफ्ज़ 
सतह को छूकर , बेरंग से  
बैठ जाते हैं आकर 
मन के  उसी कोने में चुपचाप 

यूँ तो पन्नों पर 
पसर जाती है एक पूरी नज़्म 
फिर भी 
कलम तलाशती रहती है 
उन ख़ामोश लफ्ज़ों को 
मन टटोलता रहता है 
कुछ पूरा ..वो अनचिन्हा !!

(अधूरा कुछ भी नहीं ..जो कुछ है उसका होना है ..उसका घटित होना ...पूरा या अधूरा नामालूम किस घड़ी मन में चिन्हित हुए ...मालूम है तो बस इतना कि पूरे से ज़रा सा कम है ...)


सु-मन 




36 टिप्‍पणियां:

  1. पूरा कभी हो ही नहीं पाता --कुछ न कुछ शेष रह जाता है हमेशा !

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  2. पूरा कभी हो ही नहीं पाता ,कुछ-न-कुछ शेष रह जाता है हमेशा !

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    1. सही कहा आपने ...और वो शेष ही सृजनशीलता का आधार है ।

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  3. कहाँ हो पाता है मन चाहा पूरा..और इस सम्पूर्णता की तलाश ही जीवन है...बहुत प्रभावी रचना..

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  4. पूरा उतर आये पन्नों पर फिर भी रहता कुछ अधूरा सा !
    भावपूर्ण अभिव्यक्ति !

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  5. सच है! न जाने क्यूँ अक्सर बहुत कुछ पूरा होते हुए भी सब कुछ अधूरा ही लगता है।

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  6. रह ही जाता है कुछ ऐसा जिसे हम शब्दो मे व्यक्त नही कर पाते...,सुन्दर भाव...

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  7. अधूरा कुछ भी नहीं ..जो कुछ है उसका होना है ..उसका घटित होना ...पूरा या अधूरा नामालूम किस घड़ी मन में चिन्हित हुए ...मालूम है तो बस इतना कि पूरे से ज़रा सा कम है ...
    बहुत ही खूबसूरत कविता , आत्म विश्लेषण

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  8. सुन्दर कविता |ब्लॉग पर आने हेतु शुक्रिया |

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  9. मृत्यु और जीवन दो दरवाज़े हैं जीवात्मा एक दरवाज़े से निकल कर दूसरे में प्रवेश करता है। अंतकाल में व्यक्ति जो सोचता है उसी को प्राप्त होता है जो कृष्णभावना अमृत में रहता है वह वैकुण्ठ को जाता है उसके लिए यह अंतिम मृत्यु यानी परान्तकाल साबित होती है। सुन्दर पोस्ट।

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  10. सुन्दर ,
    आभार ,
    आपके ब्लॉग पर फीडबर्नर सुविधा नहीं दिखी जिससे की आपके लेख सीधे मेल पर प्राप्त कर सके ,मेरा मेल - manoj.shiva72@gmail.com

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