बुधवार, 27 अगस्त 2014

मुहब्बत का समीकरण









मुहब्बत पक्का ना थी
कभी कुछ गम
जमा हो जाता
कभी इकरार की हदें
नफ़ी हो जाती
कभी बेहिसाब मिलन के पलों को
गुणा कर
विरह के दिनों से
विभाजित कर देते
पर हल में जो भी शेष बचता
मुझे सिर्फ़ हमारा होने का सकूं देता...

हाँ , मुझे प्रिय है
हमारी मुहब्बत का ये समीकरण !!



सु-मन 

22 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28-08-2014 को मंच पर चर्चा - 1719 में दिया गया है
    आभार

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  2. समीकरण बेहद सटीक लगा ........क्या बात है!

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  3. कल 29/अगस्त/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  4. बहुत सार्थक रचना :

    मोहब्बत में कोई मुसीबत नहीं है ,

    मुसीबत तो ये है मोहब्बत नहीं है।

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  5. इस समीकरण में .... मुहब्‍बत जो है
    .........बहुत बढिया

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  6. हर मुहब्बत के समीकरण का फलन एक ही तो होता है , अच्छी सार्थक रचना

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  7. जोड़-बाकी-गुणा-भाग ,सब आ गया ,समीकरण बन गया - बस एक निश्चित उत्तर और निकल आए!

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  8. दिल को छूती हुयी बेहद खुबसूरत रचना ......!!!!

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