मंगलवार, 19 मई 2015

शबनमी मोती














....रात 
दर्द की शबनम से 
निकले कुछ हर्फ़ फलक से 
और आ बैठे मेरे सरहाने 
घुल कर अश्कों से 
टिमटिमाने लगे मोती की तरह 
जाने कितने मोती बीन कर 
रख लिए कोरे कागज़ पर 
फिर बंद कर दी किताब 
ज़ेहन में भींच कर |

सुबह तलक -
धुन्धली होती रही रात 
मोती ज़ेहन को चुपचाप शबनमी करते रहे !!


सु-मन 

शुक्रवार, 8 मई 2015

हाँ मैं नास्तिक हूँ













हाँ मैं नास्तिक हूँ
नहीं बजाती
रोज़ मंदिरों की घंटियाँ
ना ही जलाती हूँ
आस का दीपक
नहीं देती
ईश्वर को दुखों की दुहाई
ना ही करती हूँ
क्षणिक सुखों की कामना
नहीं चढ़ाती
जल फूल फल मेवा
ना ही जपती हूँ
आस्था के मनके की माला |

हाँ मैं दूर बैठ
मांगती हूँ
अपने कर्मों को भोगने की शक्ति
जीए जा सकने वाली सहनशीलता
अपने कर्तव्यों के निर्वहन की क्षमता
सुख दुख को आत्मसात करने का सम्बल
मृत्यु का अभिनन्दन करने का साहस |

हाँ मैं नास्तिक हूँ
हाँ मैं नास्तिक हूँ !!

सु-मन