बुधवार, 5 अगस्त 2015

स्मृतियों का आकाश
















बाबुल !
स्मृतियों का आकाश
आज है भरा भरा
उड़ रहे तुम्हारे नेह के परिंदे
मैं जमीन पर खड़ी
देख रही तुम्हारी काल्पनिक छवि
तुम हो
दूर ..बहुत दूर
पर तुम्हारा एहसास
आज भी जीवंत है
मेरी रूह में
देता है मुझे शुभ आशीष
जीवन के हर पथ पर
चलता है मुझ संग हर कदम
तुम हो और रहोगे
मेरे साथ अंतिम क्षण तक
मेरी रगों में दौड़ोगे लहू बन कर
देखोगे मेरी आँखों से
अपना मनचाहा आकाश
भरोगे उड़ान सपनों की
थाम कर मेरी बांह
उड़ा ले जाओगे मुझे
संग अपने
दूर क्षितिज़ के उस पार
दोगे मेरी कल्पनाओं को पंख !!

सु-मन

(आज बाबु जी को गुजरे 3 साल हो गए | कमी तो हर पल सालती है मन को पर उनका एहसास हमेशा है और रहेगा)