गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

सुमन की पाती


























अप्रैल 2014 की बात है , नवरात्रे चल रहे थे और मेरे छत पर ये गुलाब महक रहे थे | मॉम रोज़ एक फूल देवी माँ को चढ़ाना चाहते थे और मैं इन फूलों से इनके हिस्से की जिंदगी नहीं छीनना चाहती थी और आज भी इन फूलों को नहीं तोड़ने देती हूँ , कैसे तोडू ये बस यही कहते हैं मुझसे ...



मेरी बगिया का सुमन मुझसे ये कहता है ..

सुमन कहे पुकार के , सु-मन मुझे न तोड़
महकाऊँ घर आँगन , मुझसे मुँह न मोड़

ये डाली मुझे प्यारी , नहीं देवालय की चाह
बतियाऊँ रोज़ तुमसे , रहने दे अपनी पनाह

 मैं सु-मन , सुमन को ये कहती है ...

तू सुमन मैं भी सु-मन , जानू तेरे एहसास
खिलता रहे तू हमेशा . मत हो यूँ उदास  

तेरी चाह मुझे प्यारी , नहीं करूंगी तुझे अर्पण
देव होता भाव का भूखा , मन से होए है समर्पण !!



सु-मन 

शनिवार, 25 मार्च 2017

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (९)


आजकल बहुत सारे शब्द मेरे ज़ेहन में घूमते रहते हैं इतने कि समेट नहीं पा रही हूँ अनगिनत शब्द अंदर जाकर चुपचाप बैठ गए हैं । एक दोस्त की बात याद आ रही है जब कुछ अरसा पहले यूँ ही शब्द मेरे ज़ेहन में कैद हो गए थे ।उसने कहा था , ' सुमी ! अक्सर ऐसा होता है जब बहुत सारे शब्द हमारे अंदर इकट्ठे हो जाते हैं और हमसे आँख मिचोली खेलते हैं । हमारे लाख बुलाने पर भी बाहर नहीं आते । होने दो इकट्ठे इन्हें अपने अंदर ,एक दिन खुद-ब-खुद बाहर आ जाएंगे और पन्नों पर उतर जाएंगे ।' कुछ वक़्त बाद सच में वो शब्द लौट आये मेरे पास मेरे डायरी के पन्नों पर उतर गए । 
उस दोस्त की बात मुझे अक्सर याद आती है जब भी एक कैद से मुक्त होकर शब्द मुझसे बात करते हैं । उस दोस्त से अब ज्यादा बात नहीं होती जिंदगी की भागदौड़ बहुत बढ़ गई है ना । उसे तो अपनी कही ये बात भी याद नहीं होगी शायद |

मैं इंतजार में हूँ कि  अबके भी शब्द मेरी सुन लें और लौट आये मुझ तक कि मेरी डायरी के पन्नों में बसंत खिलना बाकी है अभी !!

सु-मन 

सोमवार, 20 मार्च 2017

वो लड़की ~ 4
















वो लड़की
अक्सर देखती रहती
सूर्य किरणों में उपजे
छोटे सुनहरी कणों को
हाथ बढ़ा पकड़ लेती
दबा कर बंद मुट्ठी में
ले आती अपने कमरे में
खोल कर मुट्ठी
बिखेर देती सुनहरापन
:
रात, पनीली आँखों में
चाँद को भरकर
ठीक इस तरह
रख देती कमरे में
शबनमी चाँदनी
खिड़की और दरवाजे को बंद कर
गुनगुनाती कोई मनचाहा गीत
वो लड़की पगली बेहिसाब है !!


सु-मन 

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

प्रेम















प्रेम !
हर दिन का उजाला
हर रात की चाँदनी
हर दोपहर की तपिश
हर शाम की मदहोशी

तुम्हें एक दिन में समेट पाऊं
इतनी खुदगर्ज़ नहीं .....

मेरे प्रिय !
तुम्हें चिन्हित
तुम्हारा ये दिन
तुम्हें बहुत बहुत मुबारक !!


सु-मन  

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

वो लड़की ~ 3













बहुत उदास सी है 
शाम आज 
आसमान भी
खाली खाली 
घर की ओर बढ़ते
उसके कदमों में 
है कुछ भारीपन 
यूँ तो अकसर 
दबे पाँव ही आती है 
ये उदासी 
पर आज 
न जाने क्यूँ 
इसकी आहट में 
है चुभन सी 
जो उसकी रूह को 
कचोटती हुई 
भर रही है 
उसकी नसों में 
एक धीमा ज़हर 
और वो 
अजाने ही उसको 
समेट रही 
आँखों के प्याले में 
पी रही 
घूँट घूँट नमी 
वो लड़की बहुत उदास है !!


सु-मन