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गुरुवार, 13 जुलाई 2017

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (११)




                           सुबह और रात के बीच बाट जोहता एक खाली दिन ... इतना खाली कि बहुत कुछ समा लेने के बावजूद भी खाली .... कितने लम्हें ..कितने अहसास ...फिर भी खाली ... सूरज की तपिश से भी अतृप्त .. बस बीत जाना चाहता है | तलाश रहा कुछ ठहराव .. जहाँ कुछ पल ठहर सके ...अपने खालीपन को भर सके  ।



ठहराव जरुरी है नव सृजन के लिए ... 
इसलिए ऐ शाम ! 
रख रही हूँ एक और दिन तेरी दहलीज़ पर !!



सु-मन