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रविवार, 24 जून 2018

जिंदगी



ठक ठक ...
कौन ? अंदर से आवाज़ आई |
मैं \ बाहर से उत्तर आया |
मैं !! मैं कौन ?
जिंदगी .... , उसने जवाब दिया |
अच्छा ! किसकी ? \ अंदर से सवाल |
तुम्हारी \ भूल गई मुझे ... | इसी बीच मन के अधखुले दरवाजे को लांघ कर उसने भीतर प्रवेश कर लिया |

मैं कभी किसी को नहीं भूलती \ पर अकसर खुद को भूला देती हूँ दूसरों के लिए |
हाँ , मैं जानती हूँ \ उसने कहा
कैसे ?
तुम्हारी जी हुई जिंदगी हूँ ना , तुम्हें अच्छे से जानती हूँ | वो मुस्कराई |
ओह !! आज क्या जानने आई हो | सवालों की तल्खी उदासी को खुद-ब-खुद बयाँ कर रही थी |
देखने आई हूँ कि तुम ठीक हो या नहीं |
क्यूँ ? मुझे क्या हुआ है |
ये तो सिर्फ तुम्हें और मुझे मालूम है |
हम्म |
फिर आज रात फिर से नहीं सोई होगी |
हाँ नहीं सोई \ तो ? जवाब में सवाल की गूँज थी |
मुझे याद करती रही ना \ सोचती रही हर उस पल के बारे में जिसमें हर साँस मौत से लड़ी थी तुम | भूल क्यूँ नहीं जाती तुम ?
क्यूँ हर साल ये दिन याद रखती हो ? जिंदगी बोले जा रही थी |

कैसे भूल जाऊं \ बोलो , कैसे भूल जाऊं | इस दिन का हर पल मेरे आँखों के सामने घूम रहा | जिंदगी और मौत लड़ाई में जीया वो वक्त भूल जाऊं ? अंतर्मन फूट पड़ा |
उसे याद करके भी तो उदास हो जाती हो तुम \ जिंदगी बोली |
तो तुम क्यूँ बार बार मेरे मन में दस्तक देती हो \ तुम तो बीती जिंदगी हो ना \ जी लिया है तुमको , तुम्हारा काम खत्म \ तो क्यूँ बार बार मुझे तंग करती हो |
तुम बुलाती हो मुझे \ जिंदगी बोली
मैं????
हाँ ! तुम....
सुनो ! इस दिन जिंदगी और मौत की लड़ाई जीत कर तुम्हें नई जिंदगी मिली \  मौत की उस लड़ाई में तुमने जो सहन किया वो तुम्हारी हिम्मत थी \ इस दिन को याद रखो ईश्वर को शुक्रिया करने के लिए कि तुमको नई जिंदगी मिली |
मैं तो बीती जिंदगी हूँ किसी भी कमजोर पल इंसान के मन के दरवाजे पर दस्तक दे देती हूँ | पर याद रखना कोई भी दुख मन के गहरेपन से गहरा नहीं होता और हर सुख ताउम्र सकून नहीं देता | वर्तमान में जीना सीखो \ इससे तुम भी खुश रहोगी और मैं भी |
अच्छा ! तुम कैसे ?
क्यूँ ? मुझे ब्रेक नहीं चाहिए क्या ?
हर साल इस दिन मुझे उदास होकर बुला लेती हो \ इतना डिस्टर्ब  करती हो मुझे | जिंदगी बोली |
ओके \ अब नहीं करूँगी
पक्का ??
हम्म ||
तो मैंने जाऊँ ?
हूँ जाओ |
अगली साल तो नहीं बुलाओगी ?
हाँ !!
क्याssss \ जिंदगी पीछे मुड़कर बोली |
ईश्वर का शुक्रिया करने के लिए – उसने उत्तर दिया |
वर्तमान में जीने के लिए खुशनुमा पल छोड़कर बीती जिंदगी मुस्कराहट के साथ मन के दरवाजे के पार निकल गई |

 सु-मन 
( इस लघु कहानी में पात्र को परिभाषित न करना ही उचित लगा सो नहीं किया | शायद ये हर इंसान के अंदर छिपा पात्र है शायद इसलिए )

शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

दोस्त



                        मिनी ने पक्का सोच लिया था कि अब वो कबीर से कभी बात नहीं करेगी | बात तो क्या कभी मैसेज भी नहीं करेगी | आज सोमवार था मिनी ऑफिस में अपने काम मैं काफी व्यस्त थी | तभी उसे लगा कि कुछ कम्पन हो रही ..पास रखी अलमारी के हिलने की आवाज़ इतनी थी कि ये समझ आ चूका था कि भूकंप के तेज़ झटकों से धरती हिल रही है | थोड़ी देर में सब शांत हो गया फिर सब अपने अपने काम में लग गए पर मिनी का मन शांत नहीं था उसने मोबाइल उठाया , डायलड नम्बर पर नाम था – कबीर |
उस ओर से आवाज़ आई – हैलो
मिनी – हैलो , तुम ठीक हो ना |
कबीर – अरे हाँ ! क्यूँ क्या हुआ | अभी भूकंप आया था | डर गई थी |
मिनी – इसमें डर की क्या बात है | ओह ! सौरी , डिस्टर्ब किया |  तुम्हारा इतना कीमती वक़्त ख़राब किया | वेल्ही तो मैं हूँ |
कबीर – हा हा |
मिनी – यू नेवर टेक मी सिरियस |
कबीर – अच्छा !!
मिनी – मैंने सोचा था नहीं करूँगी बात ..कभी नहीं करूँगी ..दिवाली आने वाली है न ..तब विश भी नहीं करूँगी | मुझे भी तो कितना काम होता है फिर भी वक़्त निकालती हूँ पर तुम तो ओवर बीज़ी पर्सन हो | नहीं करूँगी बात देख लेना |
कबीर – फिर अब क्यूँ किया |
मिनी – पागल जो हूँ |
कबीर – वो तो तुम हो ही मेरी तरह |
मिनी – तुम नहीं हो |
कबीर – और कुछ ?
मिनी – सौरी .. पता नहीं क्यूँ गुस्सा सा है |
कबीर – मुझ पर ?
मिनी – पता नहीं ..खुद पर ..क्योंकि मेरा ही दोष है |
कबीर – क्योंकि मेरा ही दोष है की जगह ‘ मेरा ही दोस्त है ’ बस ये कह दो सब सही जायेगा |
कबीर के इस उत्तर पर उसके पास कोई और सवाल नहीं था | मिनी अब चुप हो गई और उसका मन शांत |

सु-मन 
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