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शनिवार, 28 मार्च 2020

इंडिया लॉक डाउन डायरी ~ Day 4 (नाना नानी के घर)












सूने पड़े हैं आजकल नाना नानी के घर
नहीं होती टीवी के रिमोट के लिए लड़ाई
नानी सीख गई है वीडियो कॉल करना
अपनी दिनचर्या की रिपोर्ट देती सारी
बच्चे फ्लाईंग किस कर बोलते MISS U
नानी जवाब में दुआएँ देती ढेर सारी
बेटी दामाद बोलते घर में बोर हो गए माँ
माँ घर से ना निकलने की देती हिदायतें भारी
एक अलग सा निखार आ गया है रिश्तों में
पूछते सब एक दूसरे का हालचाल और खुमारी
कोरोना ने सीखा दिया जीवन का महत्व
घर बना सुरक्षा कवच बाहर फैली है महामारी !!


सु-मन 

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

नेह का बंधन



आज सोम वार था | राखी को अब सिर्फ एक हफ्ता ही रह गया था आज से ठीक सात दिन बाद सोमवार को राखी थी | बातों ही बातों में रिया ने अनुज को बोला – मैं आपको राखी भेजूं ? पहनोगे ...फिर चुप हो गई |
...सॉरी
अनुज - अरे सॉरी क्यूँ
रिया – बस ऐसे ही बाधुंगी ..कोई रिश्ता नहीं थोपूंगी | आप जीजू होने के साथ साथ मेरे दोस्त भी हो ना .. सो आई जस्ट शेयर माई थॉट
अनुज- बिलकुल पहनूंगा और रिश्ता भी मानूंगा | इसमें थोपने जैसा कुछ नहीं रियु का अधिकार है यह तो
रिया - सच्ची ! उसके होठों पे प्यारी मुस्कान थी | फिर बोली - कोई पूछेगा फिर ?
अनुज - तो बता दूंगा | इसमें छुपाने जैसा क्या |
रिया - नहीं , नहीं भेजूंगी  ..नहीं तो आप फिर बोलोगे मैं तो जीजू हूँ तुम्हारा | अब जीजू क्यूँ बोला ...पापू क्यूँ बोला ..दोस्त क्यूँ बोला |
अनुज – ये बात तो है | तुम्हारी दीदी बोलेगी पहले मेरी बहन अब आपकी हा हा
रिया उदासी भरे लहजे में - रहने दो | मैं भी फिजूल ही बोलती हूँ | रिया की आँखों में अब खारे बादल घिर आये थे |
अनुज - अरे नहीं अब तो रियु मेरी दीदी है । खूब तंग करूंगा अपनी दीदी को |
मैं आपसे बड़ी थोड़े हूँ जो आप मुझे दीदी बोलोगे , रिया ने बोला |
अरे ! तो क्या हुआ, तुम भी तो कभी कभी मुझे छोटे बच्चे जैसा डांटती हो तो मैं छोटा थोड़े ना हूँ तुमसे, अनुज ने रिया को हंसाने के लिए उसी के लहजे में कहा |
अब तो मैं जरूर बांधूंगा एक डोरी अपने से वो डोरी नहीं रियु का स्नेह होगा इत्ता जो सोचता हो मेरे बारे में उसकी बात तो पक्का मानना है मुझे
यू मेक मी क्राई पापू  - रिया कि आवाज़ में नमी थी |
बस मन में बात आई सो कह दी | आप  जानते हो ना रिश्तों को लेकर मेरी सोच थोड़ी अलग है | मेरे लिए रक्षा बंधन मतलब रक्षा के लिए बांधी जाने वाली डोरी | वो डोरी आप किसी को भी बांध सकते हो जिसे आप अपना मानते हो |
अनुज - अरे रियु , मैं भी यही सोच रहा कि रियु मुझे रक्षा कवच बांधना चाह रही |
रिया - आप समझ गए थे न मेरी फीलिंग जीजू |
अनुज - तुम बिलकुल वैसे ही सोचती हो जैसा मैं सोचता हूँ । तुम्हारा मन है मुझे डोरी बाँधने का मैं स्वयं बांधूंगा पर यक़ीन मानो ऐसा ही महसूस होगा मुझे जैसे रियु बांध रहा हो
रिया – हूँ ! आप मन हो तो बांध लेना | मैं कुछ ज्यादा ही बोलती हूँ ना
अनुज - नहीं ज्यादा नहीं एकदम साफ बोलते हो रियु तुम ...जो मन भीतर वही बाहर जो सच्चा होता है दिल का वही ऐसे बोल पाता है
रिया - पता नी | पर सबको पसंद नही आती
अनुज - मैंने तो इस बार डोरी बांधनी ही बांधनी है सच किसे और कब पसंद आया है
रिया - मैं आपको तंग करती हूँ ना
अनुज - अच्छा लगता है
रिया - जैसी डोरी मैं बोलूंगी ..वैसी डालोगे ना
अनुज - और क्या पिक भेजो उसे देख ले लूँगा
रिया - हूँ और जब पहनोगे तो सबसे पहले मैं आपका बेटू देखेगा
अनुज - पक्का
रिया - थंक्यु ..मैं पागल हूँ ना
अनुज - गल तो सोणी करती हो , पागल का नहीं पता
रिया - फादर डे पर पापू बना देती हूँ ..राखी पर भाई .. फ्रेंडशिप डे पर दोस्त ...वैसे जीजू तो आप हो ही मेरे .. पागल ही हुई ना
अनुज - हा हा
रिया - हर एक इस तरह का बिहेवियर नहीं समझ पाते ना ..जैसा मेरा है |
अनुज - जो दिल करे मान लो तुम्हारा जीजू तुम्हारा दोस्त भी है | अच्छे और सच्चे दोस्त आपस में ऐसे ही होते हैं सब रिश्ते बनते भी है और निभते भी हैं
रिया - आप समझते हो ना
अनुज - लगता तो है
रिया - पर सभी नहीं समझते
अनुज - कोई नहीं सोचो ही मत
रिया - मुझे नहीं पता मैं , मेरी जिंदगी में जो रिश्ते मैंने खुद बनाये हैं या जो रिश्ते मुझे जन्म से मिले हैं उन्हें ता-उम्र सही तरीके से निभा पाऊँगी या नहीं पर अपने आज में उन सभी रिश्तों को अच्छे से निभाना चाहती हूँ |
अनुज -  तुम इत्ता अच्छा सोचती हो रियु
रिया - जो खुद अच्छे होते हैं उन्हें सब अच्छे लगते है जीजू
अनुज - तुम्हारी बातों से तुम्हारे मन और मस्तिष्क का हाल मिलता है मुझे एकदम साफ़ साफ
रियु - हा हा , अच्छा ! क्या हाल मिलता है
अनुज - कि तुम चाह कर भी बुरी नहीं हो सकती ...!!
फ़ोन कट चूका था | रियु गूगल पर अपने जीजू के लिए डोरी की तस्वीरें देखने लगी,  उसकी  आँखों के खारे बादल अब छंटने लगे थे...!!

सु-मन

मंगलवार, 24 मार्च 2015

पहले और बाद











उम्र शुरू होने के ठीक पहले
और उम्र ढल जाने के ठीक बाद
होती हैं बहुत सारी बातें
अनगिनत आँकी जाने वाली अटकलें
रख लिया जाता वजूद कसौटी पर
दम तोड़ जाते हैं कुछ रिश्ते
और चेहरा देता है गवाही
वक़्त के कटहरे में खड़े होकर ।

हाथ थामने से ठीक पहले
और हाथ छूट जाने के ठीक बाद
होता है बहुत कुछ कहने को
रह जाते हैं जुबान पर टिक कर
कुछ अनकहे शब्द
दिल की हांडी में पकते रहते है
कुछ ख़्वाब, दिलासे और ढेर सारे जज़्बात
जिंदगी होती है बसर
यादों की चिंगारी में जलकर ।

गांठ पड़ने से ठीक पहले
और गांठ खुल जाने के ठीक बाद
होता है रिश्ता कुछ और
बिखर जाती हैं हर तरफ
वहम के बेहिसाब रेशों की कतरने
टिकी रहती है सूई की नोक पर 
विश्वास के पहनावे से उधड़ी आस
उम्र देखती है एक कोने में बैठ
रफ्फू के कच्चे धागों की पकड़ ।

अंतिम साँस से ठीक पहले 
और साँस टूट जाने के ठीक बाद 
होता है क्या कुछ, नहीं पता
पता है तो बस इतना 
साँस लेना एक आदत है शायद 
एक निर्लज आदत ,एक बेशर्म रवायत 
जो नहीं बदलती 
उम्र शुरू होने से उम्र ढलने तक
जो नहीं छूटती
हाथ थामने से हाथ छूटने तक 
जो नहीं टूटती 
गाँठ पड़ने से गाँठ खुलने तक ।

पहले पल से ठीक पहले 
और बाद पल के ठीक बाद 
होता है बहुत कुछ अनचिन्हा
इन शब्दों के दायरे से परे 
चिन्हित है तो बस इतना कि 
एक आदत में गुजर जाती है जिंदगी
एक गाँठ में सिमट जाती है आख़िरी साँस !!


सु-मन 

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

तब और अब









तब 


हल्का हल्का 

दर्द था 
छोटी छोटी 
ख़्वाहिशें थी ....

गहरा गहरा 

रिश्ता था 
महकी महकी 
आशाएं थी ..... 

भरा भरा 

दरिया था 
प्यासी प्यासी 
बारिशें थी ......














...अब 

अलग अलग 

रास्ता है 
भूली भूली 
यादें हैं .....

टूटा टूटा 

बन्धन है 
गुढ़ी गुढ़ी 
गांठें हैं .....

सूखा सूखा 

सावन है 
भरी भरी 
आँखें हैं ....... !!


सु..मन 

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

उम्र पार की वो औरत











इक पड़ाव पर ठहर कर
अपनी सोच को कर जुदा
सिमट एक दायरे में
करती स्व का विसर्जन
चलती है एक अलग डगर
उम्र पार की वो औरत |

देह के पिंजर में कैद
उम्र को पल-पल संभालती
वक्त के दर्पण की दरार से
निहारती अपने दो अक्स
ढूंढती है उसमे अपना वजूद
उम्र पार की वो औरत |

नियति के चक्रवात में
बह जाते जब मांग टीका
कलाई से लेते हैं रुखसत
कुछ रंग बिरंगे ख्वाब
दिखती है एक जिन्दा लाश  
उम्र पार की वो औरत |

नए रिश्तों की चकाचौंध में
उपेक्षित हो अपने अंश से
बन जाती एक मेहमान
खुद अपने ही आशियाने में
तकती है मौत की राह
उम्र पार की वो औरत !!


सु..मन




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