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शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

जन्मदिन






















ऐ जिंदगी !
...जन्मदिन पर
कर दे कुछ हर्फ़ मेरे नाम
रख उन हर्फ़ों में
अश्क़ों सी ताज़गी
कलम के रंग को
कर दे लहू सा गूढ़ा लाल
भरते हर पन्ने में
डाल दे अंतिम श्वास का भाव
कि अनगिनत अनजीये लम्हों को
यादों की कब्र में सकून से दफना दूँ !!



सु-मन

रविवार, 24 जून 2018

जिंदगी



ठक ठक ...
कौन ? अंदर से आवाज़ आई |
मैं \ बाहर से उत्तर आया |
मैं !! मैं कौन ?
जिंदगी .... , उसने जवाब दिया |
अच्छा ! किसकी ? \ अंदर से सवाल |
तुम्हारी \ भूल गई मुझे ... | इसी बीच मन के अधखुले दरवाजे को लांघ कर उसने भीतर प्रवेश कर लिया |

मैं कभी किसी को नहीं भूलती \ पर अकसर खुद को भूला देती हूँ दूसरों के लिए |
हाँ , मैं जानती हूँ \ उसने कहा
कैसे ?
तुम्हारी जी हुई जिंदगी हूँ ना , तुम्हें अच्छे से जानती हूँ | वो मुस्कराई |
ओह !! आज क्या जानने आई हो | सवालों की तल्खी उदासी को खुद-ब-खुद बयाँ कर रही थी |
देखने आई हूँ कि तुम ठीक हो या नहीं |
क्यूँ ? मुझे क्या हुआ है |
ये तो सिर्फ तुम्हें और मुझे मालूम है |
हम्म |
फिर आज रात फिर से नहीं सोई होगी |
हाँ नहीं सोई \ तो ? जवाब में सवाल की गूँज थी |
मुझे याद करती रही ना \ सोचती रही हर उस पल के बारे में जिसमें हर साँस मौत से लड़ी थी तुम | भूल क्यूँ नहीं जाती तुम ?
क्यूँ हर साल ये दिन याद रखती हो ? जिंदगी बोले जा रही थी |

कैसे भूल जाऊं \ बोलो , कैसे भूल जाऊं | इस दिन का हर पल मेरे आँखों के सामने घूम रहा | जिंदगी और मौत लड़ाई में जीया वो वक्त भूल जाऊं ? अंतर्मन फूट पड़ा |
उसे याद करके भी तो उदास हो जाती हो तुम \ जिंदगी बोली |
तो तुम क्यूँ बार बार मेरे मन में दस्तक देती हो \ तुम तो बीती जिंदगी हो ना \ जी लिया है तुमको , तुम्हारा काम खत्म \ तो क्यूँ बार बार मुझे तंग करती हो |
तुम बुलाती हो मुझे \ जिंदगी बोली
मैं????
हाँ ! तुम....
सुनो ! इस दिन जिंदगी और मौत की लड़ाई जीत कर तुम्हें नई जिंदगी मिली \  मौत की उस लड़ाई में तुमने जो सहन किया वो तुम्हारी हिम्मत थी \ इस दिन को याद रखो ईश्वर को शुक्रिया करने के लिए कि तुमको नई जिंदगी मिली |
मैं तो बीती जिंदगी हूँ किसी भी कमजोर पल इंसान के मन के दरवाजे पर दस्तक दे देती हूँ | पर याद रखना कोई भी दुख मन के गहरेपन से गहरा नहीं होता और हर सुख ताउम्र सकून नहीं देता | वर्तमान में जीना सीखो \ इससे तुम भी खुश रहोगी और मैं भी |
अच्छा ! तुम कैसे ?
क्यूँ ? मुझे ब्रेक नहीं चाहिए क्या ?
हर साल इस दिन मुझे उदास होकर बुला लेती हो \ इतना डिस्टर्ब  करती हो मुझे | जिंदगी बोली |
ओके \ अब नहीं करूँगी
पक्का ??
हम्म ||
तो मैंने जाऊँ ?
हूँ जाओ |
अगली साल तो नहीं बुलाओगी ?
हाँ !!
क्याssss \ जिंदगी पीछे मुड़कर बोली |
ईश्वर का शुक्रिया करने के लिए – उसने उत्तर दिया |
वर्तमान में जीने के लिए खुशनुमा पल छोड़कर बीती जिंदगी मुस्कराहट के साथ मन के दरवाजे के पार निकल गई |

 सु-मन 
( इस लघु कहानी में पात्र को परिभाषित न करना ही उचित लगा सो नहीं किया | शायद ये हर इंसान के अंदर छिपा पात्र है शायद इसलिए )

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

ऐ मेरे नादान दिल












ऐ मेरे नादान दिलअब तो संभल जा
सच का सामना करसपनों को भूल जा

सेहरा-ए-जिंदगी है येगहरा सागर नहीं है
अनबुझी सी है प्यासन तू इसमें डूब जा
ऐ मेरे नादान दिल अब तो ....

सुलगती शमा है येसिंदूरी शाम नहीं है
पिघलता है जिस्म इसमेंन तू इसमें जल जा
ऐ मेरे नादान दिल अब तो .....

महफ़िल-ए-तन्हाई है येजश्न-ए-शाम नहीं है
तिश्नगी है जाम इसकान तू इसे पिए जा
ऐ मेरे नादान दिल अब तो .....

उल्फत का दरिया हैठहरा साहिल नहीं है
डूबते हैं अरमान इसमेंन तू इसमें बह जा

ऐ मेरे नादान दिलअब तो संभल जा
सच का सामना करसपनों को भूल जा !!


सु-मन 

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