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बुधवार, 24 जून 2015

मन की गलियों को टोहती स्मृतियाँ












जीये जाते हुए जाना
व्यर्थ नहीं होता कुछ भी
हर पल के हिस्से में
लिखा होता है कुछ खास
चाहा या अनचाहा

आस के ढेर पर बैठ
जीए जाते हैं हम अनेक पल
हर आने वाले पल में
तलाश करते हैं बस ख़ुशी
भूल जाते हैं अपने गुनाह
अपनी इच्छाओं की चाहते हैं पूर्ति  

ताउम्र देखते हैं सपने
उम्मीद के तकिये पर सर टिकाये
लेते जाते हैं सुख भरी नींद
टूट जाने पर हो जाते हैं उदास
झोली भर भर के बटोरते हैं रतजगे

वक़्त के गुजरे हिस्से से 
नहीं होता है जुदा हमारा आज
उम्र लिखती है हर नया बरस लेकिन
वक़्त और तारीख याद दिलाते हैं कुछ जीया
मन की गलियों को टोहने लगती हैं कुछ स्मृतियाँ !!
*****


सु-मन 

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

हॉट स्पॉट











चींटियों सी रेंगती है 
सीधी लाइन में गाड़ियाँ 
मशीन से दौड़े जाते हैं लोग 
रहता है मोबाईल 
24*7 ऑलवेज़ ऑन 
सजती हैं महफ़िलें 
हर रात ऑन टाईम 
खाली घर को ताकती हैं 
एसी में बंद खिड़कियाँ 
खुला आकाश रखता है 
सबको पूरा दिन हॉट 
पार्सल में लिपट कर 
खाना बजाता है डोर बैल 
शाम ढले टेरिस पर 
झूला झूलते हैं कुछ बेजान पौधे
इक शहर का व्यस्त जीवन 
यूँ हॉट स्पॉट बन जाता है !!



सु-मन 

शनिवार, 24 नवंबर 2012

वक़्त



















ऐ राही !
तुम उसे जानते हो
वो तुन्हें जानता भी नहीं
तुम संग उसके चलते हो
वो ठहरता भी नहीं
तुम पथ पर ठोकर खाते हो
वो गिरता भी नहीं
तुम मंजिल भूल जाते हो
वो भटकता भी नहीं
तुम रिश्तों से घबराते हो
वो बंधता भी नहीं
तुम भावों में घिर जाते हो
वो सिमटता भी नहीं
तुम खोकर पाना चाहते हो
वो पीछे हटता भी नहीं
तुम जीत की चाह रखते हो
वो लड़ता भी नहीं
तुम फिर से जीना चाहते हो
वो मरता भी नहीं
तुम उसे जानते हो -२
वो तुम्हे जानता भी नहीं
तुम संग उसके चलते हो
वो ठहरता भी नहीं
वो ठहरता भी नहीं !!


सु-मन  

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

बेमानी सब..........













अपनों का अपनापन झूठा सा लगता है
क्या कहें क्यों सब बेमानी सा लगता है

था सच जो दिखावा सा लगता है
हर रिश्ता अब तो टूटता सा लगता है

धागा था विश्वास का उलझा सा लगता है
पड़ गई गांठ उसमे गुमां सा लगता है

चमकता था हमेशा वो चाँद झूठा लगता है
चाँदनी से भी अब खौफ सा लगता है

था बन्धन रिश्तों का धोखा सा लगता है
हर कड़ी का सिरा खुला सा लगता है

रिश्तों का हर पहलु बदला सा लगता है
खुद जिंदगी से अपनी डर सा लगता है

छोटा दायरा सोच का बढ़ा सा लगता है
तड़पने के सिवा नहीं काम कुछ लगता है

जिंदगी रह गई है इन सोचों के लिये शायद
कुछ कम कुछ ज्यादा सबब रहता है................!!


                                                                                                           

                                                                                      सु..मन 

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

जीवन के पल

               जीवन के पल

हर गुजरा पल
                          एक याद छोड़ जाता है ,
       उस याद के भरोसे
                           एक आस छोड़ जाता है ,
        आस के बहकावे में
                         एक सांस छोड़ जाता है ,
         सांस की परछाई में
                          एक घुटन छोड़ जाता है ,
         घुटन में जकड़ कर
                          एक जीवन छोड़ जाता है ,
                 जीवन को जीने के लिये
                             एक इंसान छोड़ जाता है !!




सु..मन 
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