कुछ क़तरे हैं ये जिन्दगी के.....जो जाने अनजाने.....बरबस ही टपकते रहते हैं.....मेरे मन के आँगन में......
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मंगलवार, 19 मई 2015
गुरुवार, 26 सितंबर 2013
सितम्बर की अध ठंडी रात
सितम्बर की इस अध ठंडी रात में
मैं देख रही हूँ –
अपने हिस्से का एक खुला आकाश
और उसमे उजला सा आधा चाँद |
आधे आँगन में पड़ती
40 वोल्ट के बल्व की मद्धम रोशनी
मेरे जिस्म को छूकर
स्पन्दन सा करती ये मस्त बयार |
पास बुलाते गहरे साये से पेड़
मुझे लग रहे मेरे हमसफ़र
सुन रहा मुझे
झींगुरों का ये मधुर संगीत |
स्वप्न सा प्रतीत होता यथार्थ
मेरी आँखों को दे रहा सकून
‘मन’ कह रहा हौले से
कुछ अनकहा कुछ अनसुना !!
सु..मन
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