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मंगलवार, 19 मई 2015

शबनमी मोती














....रात 
दर्द की शबनम से 
निकले कुछ हर्फ़ फलक से 
और आ बैठे मेरे सरहाने 
घुल कर अश्कों से 
टिमटिमाने लगे मोती की तरह 
जाने कितने मोती बीन कर 
रख लिए कोरे कागज़ पर 
फिर बंद कर दी किताब 
ज़ेहन में भींच कर |

सुबह तलक -
धुन्धली होती रही रात 
मोती ज़ेहन को चुपचाप शबनमी करते रहे !!


सु-मन 

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

सितम्बर की अध ठंडी रात












सितम्बर की इस अध ठंडी रात में
मैं देख रही हूँ
अपने हिस्से का एक खुला आकाश
और उसमे उजला सा आधा चाँद |

आधे आँगन में पड़ती
40 वोल्ट के बल्व की मद्धम रोशनी
मेरे जिस्म को छूकर
स्पन्दन सा करती ये मस्त बयार |

पास बुलाते गहरे साये से पेड़
मुझे लग रहे मेरे हमसफ़र
सुन रहा मुझे
झींगुरों का ये मधुर संगीत |

स्वप्न सा प्रतीत होता यथार्थ
मेरी आँखों को दे रहा सकून
मन कह रहा हौले से
कुछ अनकहा कुछ अनसुना !!



सु..मन 
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