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शनिवार, 31 मार्च 2018

नज़्मों का इम्तिहान


















एक अरसे से 
कलम ख़ामोश थी
और लफ्ज़ छुट्टी पर

इस बरस -
नज़्मों के इम्तिहान में 
'मन' फेल हो गया ..!!

सु-मन

शनिवार, 23 अगस्त 2014

पूरे से ज़रा सा कम है ..













बारहा हुआ यूँ कि 
ज़ेहन में दबे लफ्ज़ 
निकाल दूँ बाहर 
खाली कर दूँ 
भीतर सब 
रूह पर पड़े बोझ को 
कर दूँ कुछ हल्का 
लिखूं वो सब अनचिन्हा 
जो नहीं चिन्हित कहीं और 
सिवाय इस मन के 

...पर 
हर बार 
लिखे जाने से पहले और बाद के अंतराल में  
लौट आते हैं कुछ लफ्ज़ 
सतह को छूकर , बेरंग से  
बैठ जाते हैं आकर 
मन के  उसी कोने में चुपचाप 

यूँ तो पन्नों पर 
पसर जाती है एक पूरी नज़्म 
फिर भी 
कलम तलाशती रहती है 
उन ख़ामोश लफ्ज़ों को 
मन टटोलता रहता है 
कुछ पूरा ..वो अनचिन्हा !!

(अधूरा कुछ भी नहीं ..जो कुछ है उसका होना है ..उसका घटित होना ...पूरा या अधूरा नामालूम किस घड़ी मन में चिन्हित हुए ...मालूम है तो बस इतना कि पूरे से ज़रा सा कम है ...)


सु-मन 




शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

इक उदास नज़्म











शाम की दहलीज पर
जब उदासी देती है दस्तक
खाली जाम लेकर
दौड़ आते हैं
कुछ लफ्ज़ मेरी ओर
भर देती हूँ
कुछ बेहिसाब से पल
छलकने लगता है भरा जाम
लेती हूँ एक घूँट
गहरी हो जाती है उदासी
बिखर जाते हैं लफ्ज़
बन जाती है
इक उदास नज़्म ....!!


सु..मन 
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