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गुरुवार, 26 सितंबर 2013

सितम्बर की अध ठंडी रात












सितम्बर की इस अध ठंडी रात में
मैं देख रही हूँ
अपने हिस्से का एक खुला आकाश
और उसमे उजला सा आधा चाँद |

आधे आँगन में पड़ती
40 वोल्ट के बल्व की मद्धम रोशनी
मेरे जिस्म को छूकर
स्पन्दन सा करती ये मस्त बयार |

पास बुलाते गहरे साये से पेड़
मुझे लग रहे मेरे हमसफ़र
सुन रहा मुझे
झींगुरों का ये मधुर संगीत |

स्वप्न सा प्रतीत होता यथार्थ
मेरी आँखों को दे रहा सकून
मन कह रहा हौले से
कुछ अनकहा कुछ अनसुना !!



सु..मन 

शुक्रवार, 8 जून 2012

मन बावरा




















मन बावरा
उड़ने चला
पंख बिना


टूटे पंख
छूटे सपने
बादल बरसे


कलम भीगी
लफ्ज़ पनपे
नज्म उभरी !!









सु-मन 



बुधवार, 28 दिसंबर 2011

घर के आँगन में


घर के आँगन में
नहीं खिलते अब
कोई भी फूल
न ही लगते हैं
कोई बेल बूटे

हवाएं भी उधर से होकर
गुजर जाती हैं
उस मोड़ से मुड़ कर
चली जाती हैं अब तो
पसरी रहती है उमस सी
हर वक़्त-हर घड़ी
जो लील लेती है
बची नमी को भी

वो उधर उस कोने में
हुआ करता था इक पेड़
रहता था जिसमें
एक जोड़ा पंछी का
गुनगुनाता था मेरा आंगन
उनकी प्यार की सरगम से
बिखरी रहती थी ज्यूँ
एक महक सी चहुँ ओर

अब तो रह गया है
सूखा सा तना ही उसका
नहीं उगते हैं जिस पर
अब कोई भी पत्ते
टहनियां भी कभी की
गिर चुकी हैं टूट के

अधटूटे पोखर के
अधबुने से आशियाने में
वो रहती है अब तन्हा
निहारा करती है राह
अपने बिछड़े साथी की
जो आने का बहलावा देकर
न जाने कहाँ उड़ गया

आँगन में अब
नहीं गूंजती सगरम
बस सुनाई देती है
उसकी आहें
कैसे समझाउं मैं
उस नादाँ जान को
जाने वाला नहीं आता
वापिस लौट के
उसके आंसुओं से
हो गई है रुआंसी सी
अब तो
क्यारी की मिट्टी भी
तब से...
घर के आँगन में
नहीं खिलते हैं अब
कोई भी फूल
न ही लगते हैं
कोई बेल बूटे.......!!

सु-मन

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

वटवृक्ष पत्रिका पर प्रकाशित मेरी रचना

मैं आभारी हूँ रविन्द्र प्रभात जी और वटवृक्ष की पूरी टीम की जिन्होंने मेरी रचना को पत्रिका में स्थान दिया .....
तेरा अहसास मन मेरे

तेरा अहसास मन मेरे
मेरे वजूद को
सम्पूर्ण बना देता है
और मैं
उस अहसास के
दायरे में सिमटी
बेतस लता सी
लिपट जाती हूँ
तुम्हारे स्वप्निल स्वरूप से
तब मेरा वजूद
पा लेता है
एक नया स्वरूप
उस तरंग सा
जो उभर आती है
शांत जल में
सूर्य की पहली किरण से
झिलमिलाती है ज्यूँ
हरी दूब में
ओस की नन्ही बूंद
तेरी वो खुली बाहें
मुझे समा लेती हैं
जब अपने आगोश में
तो मन मेरे
मेरा होना
सार्थक हो जाता है
मेरा अस्तित्व
पूर्णता पा जाता है
और उस समर्पण से
अभिभूत हो
मेरी रूह के जर्रे जर्रे से
तेरी खुशबू आने लगती है
महक जाता है
मेरा रोम रोम
पुलकित हो उठता है
एक सुमन सा
तेरे अहसास का
ये दायरा
पहचान करा देता है
मेरी , मेरे वजूद से
और मेरे शब्दों को
आकार दे देता है
मेरी कल्पना को
मूरत दे देता है
मैं उड़ने लगती हूँ
स्वछ्न्द गगन में
उन्मुक्त तुम संग
निर्भीक ,निडर
उस पंछी समान
जिसकी उड़ान में
कोई बन्धन नहीं
बस हर तरफ
राहें ही राहें हों
मन मेरे
तेरा ये अहसास
मुझे खुद से मिला देता है
मुझे जीना सिखा देता है
मन मेरे.....
मन मेरे...... !!
                                      सु-मन 

शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

कैद-ए-रिहाई


               

                 जिंदगी उलझने लगी है, सब्र टूटने लगा है
                 खुद की आजमाइश में, दिल डूबने लगा है ।

                 वक़्त के पहलू में , जाकर हमने देखा
                 ये रेत की तरह, हाथों से फिसलने लगा है ।


                 विचारों की जुम्बिश में, भटकता हुआ मन
                 कैद-ए-रिहाई को , अब तड़पने लगा है ।


                                     


                                                            सुमन




गुरुवार, 21 जुलाई 2011

काश ऐसा होता…....



काश ऐसा होता

      उड़ सकती मैं भी
  
      खुले आसमां में

     पंछियों की तरह

बादलों के संग

        धीरे धीरे विचरती
  
               काश ऐसा होता.........

       चल सकती मैं भी

    हवा के साथ साथ

 गुनगुनाती हुई

        रागिनी की तरह

               काश ऐसा होता..........

        पहुंच जाती मैं भी

      तारों के गुलिस्ताँ में

 चाँद के संग

           चाँदनी की तरह

           इठलाती हुई

               निशा के संग

             धीरे-धीरे विचरती


            काश ऐसा होता.......

       काश ऐसा होता.......
          

                                                                                 सु..मन 

   

शुक्रवार, 3 जून 2011

कभी-कभी सोचती हूँ...........






















जाने क्या है जाने क्या नहीं

बहुत है मगर फिर भी कुछ नहीं

तुम हो मैं हूँ और ये धरा

फिर भी जी है भरा भरा.........


कभी जो सोचूँ  तो ये पाऊँ

मन है बावरा कैसे समझाऊँ

कि न मैं हूँ न हो तुम

बस कुछ है तन्हा सा गुम.......................


                                                      
                                                                    सु..मन 

सोमवार, 7 मार्च 2011

अस्तित्व

नारी दिवस पर मेरी एक पुरानी कविता .....
      
 अस्तित्व



दी मैनें दस्तक जब इस जहाँ में

कई ख्वाइशें पलती थी मन के गावं में

सोचा था कुछ करके जाऊंगी

जहाँ को कुछ बनकर दिखलाऊंगी

बचपन बदला जवानी ने ली अंगड़ाई

जिन्दगी ने तब अपनी तस्वीर दिखाई

मन पर पड़ने लगी अब बेड़ियां

रिश्तों में होने लगी अठखेलियां

जुड़ गए कुछ नव बन्धन

मन करता रहा स्पन्दन

बनी पत्नि बहू और माँ

अर्पित कर दिया अपना जहाँ

भूली अपने अस्तित्व की चाह

कर्तव्य की पकड़ ली राह

रिश्तों की ये भूल भूलैया

बनती रही सबकी खेवैया

फिसलता रहा वक्त का पैमाना

न रुका कोई चलता रहा जमाना

चलती रही जिन्दगी नए पग

पकने लगी स्याही केशों की अब

हर रिश्ते में आ गई है दूरी

जीना बन गया है मजबूरी

भूले बच्चे भूल गई दुनियां

अब मैं हूँ और मन की गलियां

काश मैनें खुद से भी रिश्ता निभाया होता

रिश्तों संग अपना अस्तित्व भी बचाया होता.................
                                                        

                                      

                                                                                        सु..मन 

रविवार, 16 जनवरी 2011

मेरी कौन हो तुम !........ब्लॉग की पहली सालगिरह

आज बावरा मन को शूरू किए एक वर्ष हो गया और इस समय में बहुत कुछ पाया मैनें आप सभी से.....स्नेह , सुझाव और सबसे बड़ी बात आप सभी का साथ । कवि या लेखक का लिखना तब सार्थक हो जाता है जब उसकी लेखनी से उसके दिल की बात दूसरे तक पहुँच जाती है।आज ब्लॉग की पहली सालगिरह पर ये कविता आप सभी के सामने रख रही हूँ जो मेरे दिल बहुत करीब है.......



मेरी कौन हो तुम !


पूछती हो मुझसे
मेरी कौन हो तुम !



         मैं पथिक तुम राह
         मैं तरु तुम छाँव
         मैं रेत तुम किनारा
         मैं बाती तुम उजियारा


पूछती हो मुझसे मेरी..............


         मैं गीत तुम सरगम
         मैं प्रीत तुम हमदम
         मैं पंछी तुम गगन
         मैं सुमन तुम चमन


पूछती हो मुझसे मेरी..............


         मैं बादल तुम बारिश
         मैं वक्त तुम तारिख
         मैं साहिल तुम मौज
         मैं यात्रा तुम खोज

पूछती हो मुझसे मेरी...............


         मैं मन तुम विचार
         मैं शब्द तुम आकार
         मैं कृत्य तुम मान
         मैं शरीर तुम प्राण


पूछती हो मुझसे
मेरी कौन हो तुम
         मेरी कौन हो तुम...........
         मेरी कौन हो तुम...........!!


                                                                             
                                                                                  सुमन मीत

सोमवार, 1 नवंबर 2010

जीवन राग

कुछ दिनों के बाद इस ब्लॉग को शुरू किये एक साल हो जायेगा ।जब ये सफर शुरू किया तो सोचा भी न था कि आप लोगों का इतना प्यार मिलेगा ......आज न जाने क्यूँ ब्लॉग की अपनी पहली कविता आप सबके साथ साझा करना चाहती हूँ .........

जीवन राग


जीवन राग की तान मस्तानी

समझे न ये मन अभिमानी ;


बंधता नित नव बन्धन में
करता क्रंदन फिर मन ही मन में ;


गिरता संभलता चोट खाता
बावरा मन चलता ही जाता ;


जिस्म से ये रूह के तार
कर देते जब मन को लाचार ;


होता तब इच्छाओं का अर्पण
मन पर ज्यूँ यथार्थ का पदार्पण ;


छंट जाता स्वप्निल कोहरा
दिखता जीवन का स्वरूप दोहरा ;


स्मरण है आती वो तान मस्तानी
न समझा था जिसे ये मन अभिमानी !!



                                                                                 सु..मन 
                                                                                   

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

बेमानी सब..........













अपनों का अपनापन झूठा सा लगता है
क्या कहें क्यों सब बेमानी सा लगता है

था सच जो दिखावा सा लगता है
हर रिश्ता अब तो टूटता सा लगता है

धागा था विश्वास का उलझा सा लगता है
पड़ गई गांठ उसमे गुमां सा लगता है

चमकता था हमेशा वो चाँद झूठा लगता है
चाँदनी से भी अब खौफ सा लगता है

था बन्धन रिश्तों का धोखा सा लगता है
हर कड़ी का सिरा खुला सा लगता है

रिश्तों का हर पहलु बदला सा लगता है
खुद जिंदगी से अपनी डर सा लगता है

छोटा दायरा सोच का बढ़ा सा लगता है
तड़पने के सिवा नहीं काम कुछ लगता है

जिंदगी रह गई है इन सोचों के लिये शायद
कुछ कम कुछ ज्यादा सबब रहता है................!!


                                                                                                           

                                                                                      सु..मन 

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

विचारों की चहलकदमी................

ये जो हमारा मन है ......बहुत बावरा है...........और इस मन में पनपते विचार उन्मुक्त पंछी........जो बस हर वक्त दूर गगन में उड़ना चाहते हैं .........कभी भोर की पहली किरण में.....कभी शाम की लाली में.......तो कभी रात की तन्हाई में............बस चहलकदमी करते रहते हैं .....कुछ इस तरह..............


विचारों की चहलकदमी................

आँखें बन्द करने पर
           
                ख़्वाब कहाँ आते हैं ;

विचारों की चहलकदमी में

               पल बीतते जाते है ;


नहीं रुकते उसके कदम
            
               चलते ही जाते हैं ;

नहीं होता कोई बन्धन
               
               बढ़ते ही जाते हैं ;

कभी चेहरे पर हंसी
           
               कभी रुला जाते हैं ;

लाख चाहने पर भी

               पकड़ में न आते हैं ;

सुलझाने की कोशिश में

               उलझते ही जाते हैं ;

ये ‘विचारों’ की है जुम्बिश

               जिसमें सब जकड़े जाते हैं ;

ज्यूं नदी की हर मौज में

               किनारे धंसते जाते हैं !!

                                                                                     सुमन ‘मीत’

बुधवार, 12 मई 2010

तुम्हें बदलना होगा !

                          तुम्हें बदलना होगा !




जीवन की राहें
        बहुत हैं पथरीली
तुम्हें गिर कर
        फिर संभलना होगा ।

                                        भ्रम की बाहें
                                               बहुत हैं हठीली
                                        छोड़ बन्धनों को
                                               कुछ कर गुजरना होगा ।

दुनिया की निगाहें
           बहुत हैं नुकीली
तुम्हें बचकर
           आगे बढ़ना होगा ।

                                        रिश्तों की हवाएँ
                                                बहुत हैं जकड़ीली
                                        छोड़ तृष्णा को
                                                मुक्त हो जाना होगा ।

ऐ ‘मन’
             तुम्हें बदलना होगा
                                     बदलना होगा
                                                      बदलना होगा !!




                                                              ...सुमन ‘मीत’...


                                                                 
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