Click here for Myspace Layouts

सर्वाधिकार सुरक्षित

सर्वाधिकार सुरक्षित @इस ब्लॉग पर प्रकाशित हर रचना के अधिकार लेखक के पास सुरक्षित हैं |

बुधवार, 27 अगस्त 2014

मुहब्बत का समीकरण









मुहब्बत पक्का ना थी
कभी कुछ गम
जमा हो जाता
कभी इकरार की हदें
नफ़ी हो जाती
कभी बेहिसाब मिलन के पलों को
गुणा कर
विरह के दिनों से
विभाजित कर देते
पर हल में जो भी शेष बचता
मुझे सिर्फ़ हमारा होने का सकूं देता...

हाँ , मुझे प्रिय है
हमारी मुहब्बत का ये समीकरण !!



सु-मन