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बुधवार, 24 जून 2020

और मैं जी लिया










एक क्षण -
ओझल हो गया सब
भूत का बोझ उठाये
शिथिल कदमों में आ गई आतुरता
झुक गया 'मैं' का स्वामित्व

आसान न था
उस पार का सफर
मिथिल भ्रम की उपासना का मोह
जन्मजात क्रियाओं का दम्भ
बहुतेरा था इस पार के स्थायित्व के लिए

मझधार, भावनाओं का ज्वार
डोलता रहा इस पार से उस पार
स्थितप्रज्ञ तुम देखते रहे मेरा बे-मेल प्रवाह
'मैं' तलाशता रहा तुम्हारी बाहों का सहारा

बाद,एक क्षण -
जब बंद थी आँखें
श्वास होकर भी श्वास रहित अनुभूति
कदम निश्चेत फिर भी चेतना का विस्तार
पर-स्थित तुम फिर भी मुझमें व्याप्त
ले गए मुझे बिन डोर उस पार
और उस एक क्षण जी लिया 'मैं' अपनी हर श्वास ।

सु-मन

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर चर्चा - 3743 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

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  2. बहुत अच्छा मार्मिक लिखा आपने। भाषा बहुत परिष्कृत और सुसंस्कृत है आपकी।

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २६ जून २०२० के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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