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सोमवार, 24 जून 2019

यादें कभी बंजर नहीं होती




इस दफ़ा शब्दों के मानी बदल गए
नहीं उतरे कागज़ पर , तकल्लुफ़ करते रहे

वक़्त के हाशिये पर देता रहा दस्तक
अनचिन्हा कोई प्रश्न, उत्तर की तलाश में
कागज़ फड़फड़ाता रहा देर तक
बाद उसके, थोड़ा फट कर चुप हो गया

आठ पहरों में बँटकर चूर हुआ दिन
टोहता अपना ही कुछ हिस्सा वजूद की तलाश में

एक सिरकटी याद का ज़िस्म जलता रहा
सोच के दावानल में धुआँ धुआँ
जिंदगी दूर बैठ उसे ताकती रही, अपलक
सुलगती रही बिन आग, याद के साथ साथ !!

दरअसल -
वक़्त दिन तारीख नहीं होते एक दूसरे से जुदा
शब्द ढूँढ ही लेते रास्ता कागज़ पर उतरने का
यादें कभी बंजर नहीं होती जिंदगी के रेगिस्तान में !!

सु-मन

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

वक्त की तासीर














दिन गरम है अब 
और रातें ठण्डी 

सुना है -
सूरज को लग गया है 
मुहब्बत का रोग 
सुलगने लगा है दिन भर 

शाम की माँग में 
टपकने लगा है 
उमस का सिन्धूर 
आसमां रहने लगा है ख़ामोश 

रात कहरा कर 
ढक लेती है 
ओस का आँचल 
चाँद भटकता है तन्हा रातभर 
****************

बदल रहा है मौसम शायद 
वक्त के बयार की तासीर बदल रही है !!


सु-मन 





शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

उम्र पार की वो औरत











इक पड़ाव पर ठहर कर
अपनी सोच को कर जुदा
सिमट एक दायरे में
करती स्व का विसर्जन
चलती है एक अलग डगर
उम्र पार की वो औरत |

देह के पिंजर में कैद
उम्र को पल-पल संभालती
वक्त के दर्पण की दरार से
निहारती अपने दो अक्स
ढूंढती है उसमे अपना वजूद
उम्र पार की वो औरत |

नियति के चक्रवात में
बह जाते जब मांग टीका
कलाई से लेते हैं रुखसत
कुछ रंग बिरंगे ख्वाब
दिखती है एक जिन्दा लाश  
उम्र पार की वो औरत |

नए रिश्तों की चकाचौंध में
उपेक्षित हो अपने अंश से
बन जाती एक मेहमान
खुद अपने ही आशियाने में
तकती है मौत की राह
उम्र पार की वो औरत !!


सु..मन




मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

बदला सा सब ..












ना फिज़ा बदली ना शहर बदला 
इस जगह से मेरा ठिकाना बदला 

दो घड़ी रुक ऐ वक्त तू मेरे लिए 
मेरे हिस्से का तेरा पैमाना बदला 

शब ना हो उदास इस कदर तन्हा 
वही है जाम बस मयखाना बदला 

लिखने का सबब नहीं कोई 'मन' 
मेरे लफ्ज़ो अब आशियाना बदला !!



सु..मन 



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