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सर्वाधिकार सुरक्षित

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रविवार, 30 दिसंबर 2018

जब आता है दिसम्बर






लम्बी सर्द रात में
ऊँघता है चाँद तन्हा
जर्द पत्तों को संभाले
ओढ़ लेते है दरख्त
सफेद चादर
जब आता है दिसम्बर....

धूप की मिन्नतें करते
नज़र आते हैं सुबह
ओस के मेहमान
क्यारी के बेफूल पौधे
होते हैं कुछ उदास
जब आता है दिसम्बर....

मक्की की रोटी
चूल्हे पर है पकती
क्या खूब होता जायका
सरसों के साग का
मक्खन चुपड़ के
खिलाती है माँ
जब आता है दिसम्बर....

बीते ग्यारह मास
करता हर कोई याद
क्या खोया और पाया
होता ये एहसास
बीती को बिसार कर
बढ़ता नव वर्ष की ओर
जब आता है दिसम्बर.... !!


सु-मन


#बारह_मास_नवम्बर

शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

जन्मदिन






















ऐ जिंदगी !
...जन्मदिन पर
कर दे कुछ हर्फ़ मेरे नाम
रख उन हर्फ़ों में
अश्क़ों सी ताज़गी
कलम के रंग को
कर दे लहू सा गूढ़ा लाल
भरते हर पन्ने में
डाल दे अंतिम श्वास का भाव
कि अनगिनत अनजीये लम्हों को
यादों की कब्र में सकून से दफना दूँ !!



सु-मन

मंगलवार, 27 नवंबर 2018

नवम्बर















नरम गरम धूप में
छत पर सुस्ताते हैं
सभी ख़्वाब

ठंडी रातों के
ओस भरे लिहाफ में
जब दुबक जाता है नवम्बर !!


सु-मन 

#बारह_मास








शनिवार, 24 नवंबर 2018

बुधवार, 26 सितंबर 2018

अंधा कुआँ सी है जिंदगी























जो होता है , वो दिखता नहीं
जो दिखता है , वो होता नहीं
एक अंधा कुआँ सी है जिंदगी
हर कोई गिरता है , पर संभलता नहीं ।।



सु-मन 

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

जन्मदिवस हिंदी















जन्मदिवस मुबारक प्यारी हिंदी
हर रोज हम तुम्हारा उपयोग करें |

मिले तुम्हें नई पीढ़ी का साथ
तुम संग वो दोस्ती का आगाज़ करें |

चाहे घर हो या दफ़्तर, बाज़ार
हिंदी में सब पढ़ाई लिखाई करें |

गुड मॉर्निंग के बदले बोले सुप्रभात
हम सब ये आज से शुरुआत करें |

करके अपनी मातृभाषा का सम्मान
आओ ! हम इसका गुणगान करें |


सु-मन 






गुरुवार, 6 सितंबर 2018

गुरुवार, 16 अगस्त 2018

और तुम जीत गए















पक्का निश्चय कर
साध कर अपना लक्ष्य
चले थे इस बार ये कदम
मंजिल की ओर

मन में विश्वास लिए
मान ईश्वर को पालनहार
कर दिया था अर्पित खुद को
उस दाता के द्वार

मेहनत का ध्येय लिए
कर दिए दिन रात एक
त्याग दिए थे हर सुख साधन
कर्म के इम्तिहान में

कभी किसी पल
तुम आकर मुझे डराते
तोड़ने लगते थे मेरा विश्वास
अपने दलीलों से
तब मैं -
मन में ऊर्जा सृजित कर
ख़ामोश कर देती थी तुमको
मेहनत और कर्म की प्रधानता से

बाद महीनों -
तुम फिर मेरे सामने हो
उन्हीं दलीलों के साथ
सशक्त, अडिग,ऊर्जावान
और मैं -
मेहनत के उड़ते रंग लिए
विश्वास की टूटी डोर पकड़े
ख़ामोश, मँझधार , ऊर्जाहीन ।

ऐ प्रारब्ध !
इम्तिहान में हारी मैं और तुम फिर जीत गए !!

सु-मन

सोमवार, 13 अगस्त 2018

बिछड़न












आज ...
निकाल कर 
सूखे पत्तों को 
रख दिया अलग करके
.
.
बिछड़न हिस्सों में बँट कर जीना सीखा देती है !!



सु-मन 

शनिवार, 7 जुलाई 2018

रविवार, 24 जून 2018

जिंदगी



ठक ठक ...
कौन ? अंदर से आवाज़ आई |
मैं \ बाहर से उत्तर आया |
मैं !! मैं कौन ?
जिंदगी .... , उसने जवाब दिया |
अच्छा ! किसकी ? \ अंदर से सवाल |
तुम्हारी \ भूल गई मुझे ... | इसी बीच मन के अधखुले दरवाजे को लांघ कर उसने भीतर प्रवेश कर लिया |

मैं कभी किसी को नहीं भूलती \ पर अकसर खुद को भूला देती हूँ दूसरों के लिए |
हाँ , मैं जानती हूँ \ उसने कहा
कैसे ?
तुम्हारी जी हुई जिंदगी हूँ ना , तुम्हें अच्छे से जानती हूँ | वो मुस्कराई |
ओह !! आज क्या जानने आई हो | सवालों की तल्खी उदासी को खुद-ब-खुद बयाँ कर रही थी |
देखने आई हूँ कि तुम ठीक हो या नहीं |
क्यूँ ? मुझे क्या हुआ है |
ये तो सिर्फ तुम्हें और मुझे मालूम है |
हम्म |
फिर आज रात फिर से नहीं सोई होगी |
हाँ नहीं सोई \ तो ? जवाब में सवाल की गूँज थी |
मुझे याद करती रही ना \ सोचती रही हर उस पल के बारे में जिसमें हर साँस मौत से लड़ी थी तुम | भूल क्यूँ नहीं जाती तुम ?
क्यूँ हर साल ये दिन याद रखती हो ? जिंदगी बोले जा रही थी |

कैसे भूल जाऊं \ बोलो , कैसे भूल जाऊं | इस दिन का हर पल मेरे आँखों के सामने घूम रहा | जिंदगी और मौत लड़ाई में जीया वो वक्त भूल जाऊं ? अंतर्मन फूट पड़ा |
उसे याद करके भी तो उदास हो जाती हो तुम \ जिंदगी बोली |
तो तुम क्यूँ बार बार मेरे मन में दस्तक देती हो \ तुम तो बीती जिंदगी हो ना \ जी लिया है तुमको , तुम्हारा काम खत्म \ तो क्यूँ बार बार मुझे तंग करती हो |
तुम बुलाती हो मुझे \ जिंदगी बोली
मैं????
हाँ ! तुम....
सुनो ! इस दिन जिंदगी और मौत की लड़ाई जीत कर तुम्हें नई जिंदगी मिली \  मौत की उस लड़ाई में तुमने जो सहन किया वो तुम्हारी हिम्मत थी \ इस दिन को याद रखो ईश्वर को शुक्रिया करने के लिए कि तुमको नई जिंदगी मिली |
मैं तो बीती जिंदगी हूँ किसी भी कमजोर पल इंसान के मन के दरवाजे पर दस्तक दे देती हूँ | पर याद रखना कोई भी दुख मन के गहरेपन से गहरा नहीं होता और हर सुख ताउम्र सकून नहीं देता | वर्तमान में जीना सीखो \ इससे तुम भी खुश रहोगी और मैं भी |
अच्छा ! तुम कैसे ?
क्यूँ ? मुझे ब्रेक नहीं चाहिए क्या ?
हर साल इस दिन मुझे उदास होकर बुला लेती हो \ इतना डिस्टर्ब  करती हो मुझे | जिंदगी बोली |
ओके \ अब नहीं करूँगी
पक्का ??
हम्म ||
तो मैंने जाऊँ ?
हूँ जाओ |
अगली साल तो नहीं बुलाओगी ?
हाँ !!
क्याssss \ जिंदगी पीछे मुड़कर बोली |
ईश्वर का शुक्रिया करने के लिए – उसने उत्तर दिया |
वर्तमान में जीने के लिए खुशनुमा पल छोड़कर बीती जिंदगी मुस्कराहट के साथ मन के दरवाजे के पार निकल गई |

 सु-मन 
( इस लघु कहानी में पात्र को परिभाषित न करना ही उचित लगा सो नहीं किया | शायद ये हर इंसान के अंदर छिपा पात्र है शायद इसलिए )

बुधवार, 6 जून 2018

साँसों की कैद























कोई बंदिश भी नहीं
न कोई बेड़ियाँ हाथों में
फिर भी -
जाने कितनी साँसों की कैद में
जकड़ी है ये जिंदगी ..!!


सु-मन 

शनिवार, 31 मार्च 2018