कुछ क़तरे हैं ये जिन्दगी के.....जो जाने अनजाने.....बरबस ही टपकते रहते हैं.....मेरे मन के आँगन में......
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मंगलवार, 19 मई 2015
मंगलवार, 24 जून 2014
दुख - सुख
बीत जाने पर
नहीं रहता दुख , दुख सा
मिटटी हो जाता है
उपजाऊपन से भरा
जिसमें रोपा जाता है
सुख का बीज |
जानते हो !
कैसे ?
ज्यूँ डाली टूट जाने पर
नहीं रहता जब उसका वजूद
पत्ते सूखकर
बिखर जाते हैं राह पर
तब उस राह से गुजरते हुए
समेट लेता है उनको कोई
जला लेता है अलाव
तो जानते हो
उन पत्तों की टूटन का दर्द
दवा बन जाता है
डाली से बिछोह का दुख
तब दुख नहीं रहता
अलाव में जलकर भस्म हो जाता है
होती है उसे सुख की अनुभूति
राख हो जाने के बाद |
दरअसल
हर दुख के धरातल पर
पड़ती है आने वाले सुख की नींव
और
हर सुख के बिछोने पर
जन्मता है आने वाले सुख का अंश !!
*************
सु..मन
( एक दर्द की याद में ...एक बरस बीत जाने पर )
सोमवार, 24 दिसंबर 2012
आखिर कब तक ???
कब
तक लूटती रहेगी
रोज
अस्मत सरे बाज़ार
कब
तक यूँ एक बेटी
रोज
बेआबरू की जायेगी |
कब
तक चुकानी है कीमत
उसको
एक लड़की होने की
कब
तक एक निर्दोष पर
यूँ
अंगुली उठाई जायेगी |
कब
तक शोषित होगी नारी
इस
सभ्य संकीर्ण समाज में
कब
तक उसके अरमानो की
यूँ
रोज चिता जलाई जायेगी |
कब
तक ..आखिर कब तक ???
सु-मन
रविवार, 13 मई 2012
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