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मंगलवार, 19 मई 2015

शबनमी मोती














....रात 
दर्द की शबनम से 
निकले कुछ हर्फ़ फलक से 
और आ बैठे मेरे सरहाने 
घुल कर अश्कों से 
टिमटिमाने लगे मोती की तरह 
जाने कितने मोती बीन कर 
रख लिए कोरे कागज़ पर 
फिर बंद कर दी किताब 
ज़ेहन में भींच कर |

सुबह तलक -
धुन्धली होती रही रात 
मोती ज़ेहन को चुपचाप शबनमी करते रहे !!


सु-मन 

मंगलवार, 24 जून 2014

दुख - सुख















बीत जाने पर
नहीं रहता दुख , दुख सा
मिटटी हो जाता है
उपजाऊपन से भरा
जिसमें रोपा जाता है
सुख का बीज |

जानते हो !
कैसे ?
ज्यूँ डाली टूट जाने पर
नहीं रहता जब उसका वजूद
पत्ते सूखकर
बिखर जाते हैं राह पर
तब उस राह से गुजरते हुए
समेट लेता है उनको कोई
जला लेता है अलाव
तो जानते हो
उन पत्तों की टूटन का दर्द
दवा बन जाता है
डाली से बिछोह का दुख
तब दुख नहीं रहता
अलाव में जलकर भस्म हो जाता है
होती है उसे सुख की अनुभूति
राख हो जाने के बाद |

दरअसल
हर दुख के धरातल पर
पड़ती है आने वाले सुख की नींव
और
हर सुख के बिछोने पर
जन्मता है आने वाले सुख का अंश !!

*************

सु..मन
( एक दर्द की याद में ...एक बरस बीत जाने पर ) 

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

आखिर कब तक ???


कब तक लूटती रहेगी
रोज अस्मत सरे बाज़ार
कब तक यूँ एक बेटी  
रोज बेआबरू की जायेगी |

कब तक चुकानी है कीमत
उसको एक लड़की होने की
कब तक एक निर्दोष पर
यूँ अंगुली उठाई जायेगी |

कब तक शोषित होगी नारी
इस सभ्य संकीर्ण समाज में
कब तक उसके अरमानो की   
यूँ रोज चिता जलाई जायेगी |

कब तक ..आखिर कब तक ???



सु-मन 

रविवार, 13 मई 2012

दर्द





















दर्द अब पत्थर हो गया है
आँखें वीरान पथरीली जमीन

अहसास इकहरे ही घूमते रहते हैं
इस छोर से उस छोर
अपने अस्तित्व की तलाश में...

लहू तेजाब सा रगों में बावस्ता है
दिल झुलस रहा आहिस्ता-आहिस्ता
जख्म से नासूर बनने तक...

जाने कितनी साँस बाकी है अभी
जाने और कितना दर्द पत्थर होने को है...!!  




सु-मन



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