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बुधवार, 24 जून 2020

और मैं जी लिया










एक क्षण -
ओझल हो गया सब
भूत का बोझ उठाये
शिथिल कदमों में आ गई आतुरता
झुक गया 'मैं' का स्वामित्व

आसान न था
उस पार का सफर
मिथिल भ्रम की उपासना का मोह
जन्मजात क्रियाओं का दम्भ
बहुतेरा था इस पार के स्थायित्व के लिए

मझधार, भावनाओं का ज्वार
डोलता रहा इस पार से उस पार
स्थितप्रज्ञ तुम देखते रहे मेरा बे-मेल प्रवाह
'मैं' तलाशता रहा तुम्हारी बाहों का सहारा

बाद,एक क्षण -
जब बंद थी आँखें
श्वास होकर भी श्वास रहित अनुभूति
कदम निश्चेत फिर भी चेतना का विस्तार
पर-स्थित तुम फिर भी मुझमें व्याप्त
ले गए मुझे बिन डोर उस पार
और उस एक क्षण जी लिया 'मैं' अपनी हर श्वास ।

सु-मन

शनिवार, 23 मई 2020

लॉकडाउन 4.0 का दूसरा दिन




                                                                

                    लॉकडाउन 4.0 दूसरा दिन दो दोस्त जो एक दूसरे से कोसों दूर थे पर दिल के करीब , आज कुछ ग़मगीन थे | कोरोना अब तक लगभग एक लाख इंसानों को संक्रमित कर चुका था और दिन -बदिन स्थिति बिगड़ती जा रही थी |
मानवी ने पिंग किया – क्या हम रोज आंकड़े ही गिनते जायेंगे |
विवेक – हम्म 
मानवी – कब तक ?
विवेक – जब तक ..
मानवी – जब तक क्या  ?
विवेक – जब तक हम में से बहुत सारे ....
इस अकल्पित जवाब से घबराई मानवी – ऐसा मत कहो
विवेक – सिर्फ हम सब ही लॉकडाउन खत्म होने का इंतजार नहीं कर रहे और कोरोना हमसे ज्यादा इंतजार कर रहा |
मानवी – शायद अब इंतजार के आलावा कोई और विकल्प नहीं पर इंतजार की परिभाषा रोज़ बदलेगी |
विवेक चुप था , जवाब में एक इमोज़ी बस |
मानवी का मन बहुत उद्विग्न (व्याकुल) था , लिखा – ये कब खत्म होगा ?
विवेक – जब 70% को कवर कर लेगा |
मानवी – ऐसा मत बोलो , ये सोच के दिमाग घूम गया | अच्छा एक बात बताओ |
विवेक – हम्म
मानवी – डाक्टर बोलते इलाज संभव ही नहीं तो लोग ठीक कैसे हो रहे फिर | दवाई से ही ना |
विवेक – Quite interesting .. एक थिओरी है कि एक इंसान से 2.5 इंसानों को पहुँचता और जिनका  immunity सिस्टम अच्छा होता वो survive कर जाते |
मानवी – तो सभी को immunity की वैक्सीन लगनी चाहिए ना फिर सभी ठीक रहेंगे |
विवेक - रिसर्च हो रही क्या बोल सकते हम अभी |
मानवी – क्या हम बहुत से अपनों को खो देंगे |
विवेक – भविष्य के गर्भ में क्या छिपा किसे पता |
मानवी - इसका मर्म बहुत गहरा होगा....
विवेक - गहरा या उथला क्या फर्क पड़ता है मानवी, कभी देखा है मौत को जिंदगी के लिए रोते हुए ।


दोनों तरफ अब बस सन्नाटा था । शायद लफ्ज़ों को हिम्मत नहीं थी अब कीबोर्ड में उतरने की ।
लॉकडाउन 4.0 का दूसरा दिन भारी मन के साथ तीसरे दिन में प्रवेश कर रहा था ...!!


 सु-मन



रविवार, 5 अप्रैल 2020

इंडिया लॉक डाउन डायरी ~ Day 12(आस का दीया)

Re post Today













मैंने दीया जला कर 
कर दी है रोशनी ...
तुम प्रदीप्त बन 
हर लो, मेरा सारा अविश्वास |

मेरे आराध्य !
आस के दीये में 
बची रहे नमी सुबह तलक !!


सु-मन


पढ़े ~ Day 11

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

इंडिया लॉक डाउन डायरी ~ Day 11(ऑफिस फुलवारी)

आज बहुत दिन ऑफिस जाना हुआ 
















आज मिली फिर तुमसे
बैठी कुछ देर तुम संग
की दो चार बातें 
खूब चहक रही तुम 
लाल पीले फूलों संग 
बोटल-ब्रश भी
झूम रहा था लाली से 
गुलाब और चमेली
महक रहे थे शान से
नहीं था भय तुम्हें 
किसी संक्रमण का
प्रकृति को खुद में समाये
ले रही थी जीवंत साँसे
दे रही थी मानव को 
जीवन का असली सन्देश |

मेरी फुलवारी !
कि तुम मेरे जीवंत होने का साक्ष्य हो ||


सु-मन 


पढ़े ~ Day 10

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

इंडिया लॉक डाउन डायरी ~ Day 10 (शाम)











त्रिवेणी 


ठहर गई भागदौड़ भरी जिंदगी एक पल में
जंग बिना ही बंद हो गए सब दफ़्तर के ताले

शामें खुद मयखाने सी नशीली हो गयी है आजकल !!


सु-मन 

पढ़ें ~ day 9




गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

इंडिया लॉक डाउन डायरी ~ Day 9 (राम नवमी)

राम नवमी की शुभकामनाएँ 



















सुन लो अरज अब मेरे राम  
तुम ही खैवया जपूँ तेरा नाम 
जगत पर आया है संकट भारी
हर लो सब पीड़ा कर दो कल्याण !!

सु-मन 

पढ़ें ~ Day 8

मंगलवार, 31 मार्च 2020

इंडिया लॉक डाउन डायरी ~ Day 7 (बेज़िस्म नज़्म)



बेज़िस्म नज़्म 

सब ख़ामोश है आज
'मन' भी लफ्ज़ भी
फड़फड़ा रहा तन्हा
डायरी का पन्ना खाली

सुबह की एक याद
ज़ेहन को कुतर रही
आहिस्ता - आहिस्ता
कर ही देगी शायद खाली
मेरा ये भरा सा 'मन'

पलकों के कोरों में अभी
कुछ अटक के निकल गया
धुँधला कर गया शायद
याद का कड़वा हिस्सा
जेहन की कुरचन भी
थोड़ी थमने लगी है अब

बावजूद इसके -
पन्ना ख़ामोश है
लफ्ज़ 
बेजान
और नज़्म 
बेज़िस्म
कि 'मन' आज उदास बहुत है ।।


सु-मन 

पढ़ें ~ Day 6

सोमवार, 30 मार्च 2020

रविवार, 29 मार्च 2020

इंडिया लॉक डाउन डायरी ~ Day 5 (वो शख्स)












आया था जो कल रोजी की तलाश में
वो आज दिल्ली शहर से कूच कर गया
जाता था खाना लेकर रोज़ अपने काम पे
वो शख्स आज रोटी का मोहताज़ हो गया
पलता था जो परिवार एक ही कमाई से
पैदल चल अपने गाँव खाली हाथ हो गया
नहीं चिंता उसको किसी संक्रमण की
फुटपाथ लाखों लोगों का घर बन गया
स्तब्ध हूँ देख कर - 2
वक़्त के ये बदलते तेवर
दिल्ली शहर का कैसा मंज़र बदल गया
दिल्ली शहर का कैसा मंजर बदल गया ।।


सु-मन 

पढ़ें ~ Day 4