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मंगलवार, 25 अगस्त 2015

नेह का बंधन



आज सोम वार था | राखी को अब सिर्फ एक हफ्ता ही रह गया था आज से ठीक सात दिन बाद सोमवार को राखी थी | बातों ही बातों में रिया ने अनुज को बोला – मैं आपको राखी भेजूं ? पहनोगे ...फिर चुप हो गई |
...सॉरी
अनुज - अरे सॉरी क्यूँ
रिया – बस ऐसे ही बाधुंगी ..कोई रिश्ता नहीं थोपूंगी | आप जीजू होने के साथ साथ मेरे दोस्त भी हो ना .. सो आई जस्ट शेयर माई थॉट
अनुज- बिलकुल पहनूंगा और रिश्ता भी मानूंगा | इसमें थोपने जैसा कुछ नहीं रियु का अधिकार है यह तो
रिया - सच्ची ! उसके होठों पे प्यारी मुस्कान थी | फिर बोली - कोई पूछेगा फिर ?
अनुज - तो बता दूंगा | इसमें छुपाने जैसा क्या |
रिया - नहीं , नहीं भेजूंगी  ..नहीं तो आप फिर बोलोगे मैं तो जीजू हूँ तुम्हारा | अब जीजू क्यूँ बोला ...पापू क्यूँ बोला ..दोस्त क्यूँ बोला |
अनुज – ये बात तो है | तुम्हारी दीदी बोलेगी पहले मेरी बहन अब आपकी हा हा
रिया उदासी भरे लहजे में - रहने दो | मैं भी फिजूल ही बोलती हूँ | रिया की आँखों में अब खारे बादल घिर आये थे |
अनुज - अरे नहीं अब तो रियु मेरी दीदी है । खूब तंग करूंगा अपनी दीदी को |
मैं आपसे बड़ी थोड़े हूँ जो आप मुझे दीदी बोलोगे , रिया ने बोला |
अरे ! तो क्या हुआ, तुम भी तो कभी कभी मुझे छोटे बच्चे जैसा डांटती हो तो मैं छोटा थोड़े ना हूँ तुमसे, अनुज ने रिया को हंसाने के लिए उसी के लहजे में कहा |
अब तो मैं जरूर बांधूंगा एक डोरी अपने से वो डोरी नहीं रियु का स्नेह होगा इत्ता जो सोचता हो मेरे बारे में उसकी बात तो पक्का मानना है मुझे
यू मेक मी क्राई पापू  - रिया कि आवाज़ में नमी थी |
बस मन में बात आई सो कह दी | आप  जानते हो ना रिश्तों को लेकर मेरी सोच थोड़ी अलग है | मेरे लिए रक्षा बंधन मतलब रक्षा के लिए बांधी जाने वाली डोरी | वो डोरी आप किसी को भी बांध सकते हो जिसे आप अपना मानते हो |
अनुज - अरे रियु , मैं भी यही सोच रहा कि रियु मुझे रक्षा कवच बांधना चाह रही |
रिया - आप समझ गए थे न मेरी फीलिंग जीजू |
अनुज - तुम बिलकुल वैसे ही सोचती हो जैसा मैं सोचता हूँ । तुम्हारा मन है मुझे डोरी बाँधने का मैं स्वयं बांधूंगा पर यक़ीन मानो ऐसा ही महसूस होगा मुझे जैसे रियु बांध रहा हो
रिया – हूँ ! आप मन हो तो बांध लेना | मैं कुछ ज्यादा ही बोलती हूँ ना
अनुज - नहीं ज्यादा नहीं एकदम साफ बोलते हो रियु तुम ...जो मन भीतर वही बाहर जो सच्चा होता है दिल का वही ऐसे बोल पाता है
रिया - पता नी | पर सबको पसंद नही आती
अनुज - मैंने तो इस बार डोरी बांधनी ही बांधनी है सच किसे और कब पसंद आया है
रिया - मैं आपको तंग करती हूँ ना
अनुज - अच्छा लगता है
रिया - जैसी डोरी मैं बोलूंगी ..वैसी डालोगे ना
अनुज - और क्या पिक भेजो उसे देख ले लूँगा
रिया - हूँ और जब पहनोगे तो सबसे पहले मैं आपका बेटू देखेगा
अनुज - पक्का
रिया - थंक्यु ..मैं पागल हूँ ना
अनुज - गल तो सोणी करती हो , पागल का नहीं पता
रिया - फादर डे पर पापू बना देती हूँ ..राखी पर भाई .. फ्रेंडशिप डे पर दोस्त ...वैसे जीजू तो आप हो ही मेरे .. पागल ही हुई ना
अनुज - हा हा
रिया - हर एक इस तरह का बिहेवियर नहीं समझ पाते ना ..जैसा मेरा है |
अनुज - जो दिल करे मान लो तुम्हारा जीजू तुम्हारा दोस्त भी है | अच्छे और सच्चे दोस्त आपस में ऐसे ही होते हैं सब रिश्ते बनते भी है और निभते भी हैं
रिया - आप समझते हो ना
अनुज - लगता तो है
रिया - पर सभी नहीं समझते
अनुज - कोई नहीं सोचो ही मत
रिया - मुझे नहीं पता मैं , मेरी जिंदगी में जो रिश्ते मैंने खुद बनाये हैं या जो रिश्ते मुझे जन्म से मिले हैं उन्हें ता-उम्र सही तरीके से निभा पाऊँगी या नहीं पर अपने आज में उन सभी रिश्तों को अच्छे से निभाना चाहती हूँ |
अनुज -  तुम इत्ता अच्छा सोचती हो रियु
रिया - जो खुद अच्छे होते हैं उन्हें सब अच्छे लगते है जीजू
अनुज - तुम्हारी बातों से तुम्हारे मन और मस्तिष्क का हाल मिलता है मुझे एकदम साफ़ साफ
रियु - हा हा , अच्छा ! क्या हाल मिलता है
अनुज - कि तुम चाह कर भी बुरी नहीं हो सकती ...!!
फ़ोन कट चूका था | रियु गूगल पर अपने जीजू के लिए डोरी की तस्वीरें देखने लगी,  उसकी  आँखों के खारे बादल अब छंटने लगे थे...!!

सु-मन

शनिवार, 9 अगस्त 2014

भैया सुनो !

Bhaiyu आपके लिए 










भैया सुनो !
नहीं जानती
कि क्यूँ कर
शुरू हुआ होगा
ये रक्षा बन्धन
कब,किस वजह से
बाँधी होगी किसी बहन ने
अपने भाई की कलाई पर
पहली राखी |

जानती हूँ
तो बस इतना
कि कच्चे धागे की डोरी को
बुना है मैंने
विश्वास के ताने बाने से
लगाए हैं इसमें  
अपने एहसास के रंग
और बांध दी है
तुम्हारी लम्बी उम्र की
गुढी गाँठ |

बदले इसके
नहीं मांगती कुछ
सिवाए इसके
कि ता-उम्र सम्भाले रखना
ये पवित्र बन्धन
मेरी ‘राखी’ को ना होने देना तुम राख !!


तुम्हारी बहन
सु-मन
(मेरी इस रचना को राजस्थान की Daily News अखबार के 'खुशबू' अंक में प्रकाशित करने के लिए वर्षा मिर्ज़ा जी का बहुत बहुत आभार)

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

वटवृक्ष पत्रिका पर प्रकाशित मेरी रचना

मैं आभारी हूँ रविन्द्र प्रभात जी और वटवृक्ष की पूरी टीम की जिन्होंने मेरी रचना को पत्रिका में स्थान दिया .....
तेरा अहसास मन मेरे

तेरा अहसास मन मेरे
मेरे वजूद को
सम्पूर्ण बना देता है
और मैं
उस अहसास के
दायरे में सिमटी
बेतस लता सी
लिपट जाती हूँ
तुम्हारे स्वप्निल स्वरूप से
तब मेरा वजूद
पा लेता है
एक नया स्वरूप
उस तरंग सा
जो उभर आती है
शांत जल में
सूर्य की पहली किरण से
झिलमिलाती है ज्यूँ
हरी दूब में
ओस की नन्ही बूंद
तेरी वो खुली बाहें
मुझे समा लेती हैं
जब अपने आगोश में
तो मन मेरे
मेरा होना
सार्थक हो जाता है
मेरा अस्तित्व
पूर्णता पा जाता है
और उस समर्पण से
अभिभूत हो
मेरी रूह के जर्रे जर्रे से
तेरी खुशबू आने लगती है
महक जाता है
मेरा रोम रोम
पुलकित हो उठता है
एक सुमन सा
तेरे अहसास का
ये दायरा
पहचान करा देता है
मेरी , मेरे वजूद से
और मेरे शब्दों को
आकार दे देता है
मेरी कल्पना को
मूरत दे देता है
मैं उड़ने लगती हूँ
स्वछ्न्द गगन में
उन्मुक्त तुम संग
निर्भीक ,निडर
उस पंछी समान
जिसकी उड़ान में
कोई बन्धन नहीं
बस हर तरफ
राहें ही राहें हों
मन मेरे
तेरा ये अहसास
मुझे खुद से मिला देता है
मुझे जीना सिखा देता है
मन मेरे.....
मन मेरे...... !!
                                      सु-मन 

रविवार, 16 जनवरी 2011

मेरी कौन हो तुम !........ब्लॉग की पहली सालगिरह

आज बावरा मन को शूरू किए एक वर्ष हो गया और इस समय में बहुत कुछ पाया मैनें आप सभी से.....स्नेह , सुझाव और सबसे बड़ी बात आप सभी का साथ । कवि या लेखक का लिखना तब सार्थक हो जाता है जब उसकी लेखनी से उसके दिल की बात दूसरे तक पहुँच जाती है।आज ब्लॉग की पहली सालगिरह पर ये कविता आप सभी के सामने रख रही हूँ जो मेरे दिल बहुत करीब है.......



मेरी कौन हो तुम !


पूछती हो मुझसे
मेरी कौन हो तुम !



         मैं पथिक तुम राह
         मैं तरु तुम छाँव
         मैं रेत तुम किनारा
         मैं बाती तुम उजियारा


पूछती हो मुझसे मेरी..............


         मैं गीत तुम सरगम
         मैं प्रीत तुम हमदम
         मैं पंछी तुम गगन
         मैं सुमन तुम चमन


पूछती हो मुझसे मेरी..............


         मैं बादल तुम बारिश
         मैं वक्त तुम तारिख
         मैं साहिल तुम मौज
         मैं यात्रा तुम खोज

पूछती हो मुझसे मेरी...............


         मैं मन तुम विचार
         मैं शब्द तुम आकार
         मैं कृत्य तुम मान
         मैं शरीर तुम प्राण


पूछती हो मुझसे
मेरी कौन हो तुम
         मेरी कौन हो तुम...........
         मेरी कौन हो तुम...........!!


                                                                             
                                                                                  सुमन मीत

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

तेरा अहसास........‘मन’ मेरे

तेरा अहसास.....‘मन’ मेरे
मेरे वजूद को
सम्पूर्ण बना देता है
और मैं
उस अहसास के
दायरे में सिमटी
बेतस लता सी
लिपट जाती हूँ
तुम्हारे स्वप्निल स्वरूप से
तब मेरा वजूद
पा लेता है
एक
नया स्वरूप
उस तरंग सा
जो उभर आती है
शांत जल में
सूर्य की पहली किरण से
झिलमिलाती है ज्यूँ
हरी दूब में
ओस की नन्ही बूंद
तेरी वो खुली बाहें
मुझे समा लेती हैं
जब
अपने आगोश में
तो ‘मन’ मेरे
मेरा होना सार्थक
हो जाता है
मेरा अस्तित्व
पूर्णता पा जाता है
और उस
समर्पण से अभिभूत हो
मेरी रूह के
जर्रे जर्रे से
तेरी खुशबू आने लगती है
और महक जाता है
मेरा रोम रोम......
पुलकित हो उठता है
एक ‘सुमन’ सा
तेरे अहसास का
ये दायरा
पहचान करा देता है
मेरी
मेरे वजूद से और
मेरे शब्दों को
आकार दे देता है
मेरी कल्पना को
मूरत दे देता है....
मैं
उड़ने लगती हूँ
स्वछ्न्द गगन में
उन्मुक्त
तुम संग
निर्भीक ,निडर
उस पंछी समान
जिसकी उड़ान में
कोई बन्धन नहीं
बस हर तरफ
राहें ही राहें हों.....
‘मन’ मेरे
तेरा ये अहसास
मुझे खुद से मिला देता है
मुझे जीना सिखा देता है
‘मन’ मेरे.....
‘मन’ मेरे...........!!

                                                                  
                                                                सु.मन 

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

अहसास

अहसास


एक अबोध शिशु
माँ के आँचल में
लेता है जब
गहरी नींद
माँ उसको
अपलक निहारती
बलाऐं लेती
महसूस है करती
अपने ममत्व को
                  वो आगाज़ हूँ मैं .........

विरह में निष्प्राण तन
लौट है आता
चौराहे के छोर से
लिये साथ
अतीत की परछाई
भविष्य की रुसवाई
पथरीली आँखों में
सिवाय तड़प के
कुछ नहीं
          वो टूटन हूँ मैं ...........

कोमल हृदय में
देते हैं जब दस्तक
अनकहे शब्द
उलझे विचार
मानसपटल पर
करके द्वन्द
जो उतरता है
लेखनी से पट पर
                     वो जज़्बात हूँ मैं .........

थकी बूढ़ी आँखें
जीवन की कड़वाहट का
बोझ लिए
सारी रात खंगालती हैं
निद्रा के आशियाने को
या फिर
बाट जोहती हैं
अपने अगले पड़ाव का
                    वो अभिप्राय हूँ मैं ...........




वो आगाज़ में पनपा
                      टूटन में बिखरा
                                    जज़्बात में डूबा
                                                      अभिप्राय में जन्मा
                                                                                      ‘अहसास’ हूँ मैं !!
                     
                                                                                     

                                                                                                                                  सुमन मीत

शनिवार, 7 अगस्त 2010

मेरा आसमां.............

आजकल चाँद बादलों के संग आँख मिचोली करता रहता है और मुझे मेरा आसमां कुछ यूं नजर आता है.........................




                                             मेरा आसमां
                             
                              आज मेरा आसमां धुंधला सा है
                             
                              सितारों के बगैर चाँद सूना सा है;
                              
                              बादलों की परछाई जब उसे घेर लेती
                             
                              गुमसुम सी चाँदनी जैसे मुँह फेर लेती;
                             
                              बादलों ने भी रूख पे नकाब है ओढ़ा
                             
                              छलक पड़ेगा नीर जब सरकेगा वो थोड़ा;
                             
                              तब छंटेगी धुंध मेरे आसमां की
                             
                              निखर आयेगी चाँदनी इक मेहरबां सी ..........!!

                                                                                             सु..मन 

रविवार, 9 मई 2010

अर्पित ‘सुमन’ ..... एक प्रयास

आज ये सफर 5 महिनों का होने को आया है जब कुछ लफ्ज़ मेरी

डायरी के पन्नों से इस ब्लॉग पर उभर आये थे । उस वक्त सच

कहूं तो ये सोचा न था कि ये सफर इतना सुखद होगा आप सभी

के साथ। इन बीते महिनों में आप सभी का भरपूर सहयोग मिला

और सुझाव भी। इतने दूर होकर भी हम सब जुड़े है एक डोर से ,

शब्दों की डोर से.......।

                                     आज अपना एक और ब्लॉग शुरू कर रही

हूँ अर्पित‘सुमन’http://arpitsuman.blogspot.com/ इस आशा के साथ

कि मेरे इस प्रयास में आप सभी बागवां बन कर सुमन की बगिया

को अपने स्पर्श से महक देते रहगें ।
                                                                                                                                                                                                          सुमन ‘मीत’



चन्द पंक्तियां लिखी हैं .............



                                                             जुश्तजू  



                                       कभी जिन आँखों में
                                                  
                                                 चाहत की जुश्तजू थी
                                     
                                      आज देखा तो जाना
                                                  
                                                  वो नज़र बदल गई.................

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

तेरे बगैर ............

अहसास ,संवेदनाएं सिर्फ मानव हृदय में ही नहीं पनपती अपितू हर उस जगह में समा जाती है जिससे हम जुड़े होते हैं फिर चाहे वो हमारा घर हो या हर वो जगह जो हमसे जुड़ी हो 1संवेदनाएं सभी में हैं बात सिर्फ महसूस करने की है जुड़ाव की है 1जैसे हमें अनुभूति होती है अपने घर व किसी स्थान के प्रति वैसे ही ये तथाकथित निर्जीव चीजें हमारे प्रति संवेदनशील होती हैं 1जब किसी परिवार का सदस्य कहीं चला जाता है तो सबको उसकी कमी ख़लती है वैसे ही घर व उससे जुड़ी चीजें ,जगह भी उसकी कमी को महसूस करते हैं बस बयां नहीं कर पाते अपने अहसास को सिर्फ तकते रहते हैं निशब्द .........अनजान चेहरों को कि शायद कोई उनकी संवेदनाओं को पढ़ सके..........1कुछ समय पहले किसी के जाने से उस जगह के अधूरेपन को जाना मैनें , बस उसका हर कोना ये कहता महसूस होता था ......................







तेरे बगैर............


मेरे मेहरबां
मुड़ के देख ज़रा
कैसी बेज़ारी से
गुजरता है
मेरा हर लम्हा
तेरे बगैर.....................

तुम थे – 2
तो रोशन था
मेरे ज़र्रे-ज़र्रे में
सकूं का दिया
अब तू नहीं तो – 2
जलता है
मेरा हर कतरा
गम के दिये में
तेरे बगैर.........................


तुम थे – 2
तो महकती थी
तेरी खुशबू से
मेरी फुलवारी
अब तू नहीं तो – 2
सिमट गई है
मेरी हर डाली
यादों की परछाई में
तेरे बगैर....................


तुम थे तो मैं था – 2
मेरे होने का था
कुछ सबब
सींच कर अपने प्यार से
बनाया था ये महल
अब तू नहीं तो – 2
टूट कर बिखर गया हूँ
इक मकां सा बन गया हूँ
तेरे बगैर...............
तेरे बगैर...................


                                              सु..मन 
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