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रविवार, 29 नवंबर 2020

मन तुम 'बुद्ध' हो जाना









मन !
जीवन के धरातल पर
उग आयें जब
अभीप्साओं के बीज
आँखों को तर करने लगे
दो बूँद अश्क़
वर्ष दर वर्ष मिटने लगे
उम्र की स्याही
रिश्तों की घनी छाँव भी
देह को तपाने लगे

सुनो मन -
ठीक इसके पहले
तुम निबंधित हो
ले चलना मुझे
देह से परे की डगर
अकंपित, निर्विघ्न
समाहित कर खुद में
मेरा सारा स्वरूप
मन तुम 'बुद्ध' हो जाना !!


सु-मन

बुधवार, 12 अगस्त 2020

जानते हो कनु !


















जानते हो कनु ! 
कल रात मैंने नहीं किया तुम्हारा इंतज़ार
और सो गयी सरहाने पर सिर रख कर
बिना तुम्हारा स्वागत किये ।

सारा दिन तुम्हारे नाम का उपवास किये
हर धड़कन पर तेरी मुरली का संगीत लिए
प्रतिपल विस्मृत सी तुम्हारी याद में
करती रही अपने हर काम ।

जाने क्या हुआ कनु !
जिस पहर जागा रहा सारा जगत
तुम्हारी जन्म की मंगल वेला में
वहीं अकल्पित मैं-
आँखें मूँद क्यों बैठ गयी तुम्हारे ख़याल में
निशीथ में तुम्हारे आगमन से ठीक पहले ।

तुम बाँह पसारे अठखेलियाँ करते
आये और समा गये हर मूरत, हर मन में
और मैं तुम्हारे ख़यालों की दुनिया में
अवचेतन मन से करती रही तुम्हारा सुमिरन ।

तुमने उस घड़ी मुझे क्यों नहीं जगाया कनु ?
सारे दिन तुम्हारे आगमन को लालायित मैं
क्यों अपात्र रही उस पूजा अर्पण में ....


पर जानते हो कनु !

इस क्षणभंगुर देह से परे
मेरी आत्मा में व्याप्त तुम
कैसे पृथक हो सकते हो मुझसे..
पूजा विधि से अनभिज्ञ मैं
तिरोहित कर अपना सर्वस्व तेरे चरणों में
उस पावन घड़ी भी तुममें समाहित थी ।


भाव की प्यास से तृप्त मेरे एकल योगनिद्रा स्वामी !
निद्रा के अवचेतन मन से समर्पित भाव तुमको स्वीकार्य हो !!

सु-मन



जन्मदिन मुबारक कान्हा !!

शनिवार, 3 अगस्त 2019

'मन' खुशी मुबारक !



मन !
           खुशी मुबारक |

1st अगस्त को iblogger द्वारा आयोजित Blogger of the Year 2019 Contest के परिणाम की घोषणा की गई और  Top 10 blogger of the year में अपना नाम दिखा तो मन खुश हो गया | सोचा आप सब से अपनी खुशी साझा कर लूँ , उन पाठकों से जिन्होंने मेरे लेखन को सराहा.. मेरे लफ्ज़ों को गति दी | 

विजेता , उपविजेता और सभी विजेताओं को शुभकामनाएं ....
निर्णायक मण्डल और पाठकों का तहे दिल से शुक्रिया ..

और 
मन ! मेरे हर लफ्ज़ , विचार और अभिव्यक्ति के रचयिता ..तुझे प्यार भरी झप्पी :-)


सु-मन 

शनिवार, 31 मार्च 2018

नज़्मों का इम्तिहान


















एक अरसे से 
कलम ख़ामोश थी
और लफ्ज़ छुट्टी पर

इस बरस -
नज़्मों के इम्तिहान में 
'मन' फेल हो गया ..!!

सु-मन

मंगलवार, 1 मार्च 2016

सोच की हद















हर बार सोचती हूँ
एक हद में सिमट जाऊँ
कर लूँ अपनी सोच को
एक अँधेरी कोठरी में बंद
दुनिया की रवायत संग
जीने लगूं एक बेनाम जिंदगी
बांध अपने पैरों में बेड़ियाँ
चल दूँ राह पर उस तरफ
जिस तरफ ले जाना चाहे कोई
दिल दिमाग के हर दरवाजे पर
लगा दूँ एक जंग लगा ताला
मन के वांछित कारावास से
कर दूँ निर्वासित अपना वजूद !
*****
सोच से हदें तय हुई या हदों से सोच ..कौन जाने ...जाना तो बस इतना कि हदों की खूंटी पर टंगे रहते हैं वजूद के लिबास और सोच के ज़िस्म पर पहनाई जाती हैं कुछ बेड़ियाँ !!



सु-मन 

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