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सोमवार, 24 जून 2019

यादें कभी बंजर नहीं होती




इस दफ़ा शब्दों के मानी बदल गए
नहीं उतरे कागज़ पर , तकल्लुफ़ करते रहे

वक़्त के हाशिये पर देता रहा दस्तक
अनचिन्हा कोई प्रश्न, उत्तर की तलाश में
कागज़ फड़फड़ाता रहा देर तक
बाद उसके, थोड़ा फट कर चुप हो गया

आठ पहरों में बँटकर चूर हुआ दिन
टोहता अपना ही कुछ हिस्सा वजूद की तलाश में

एक सिरकटी याद का ज़िस्म जलता रहा
सोच के दावानल में धुआँ धुआँ
जिंदगी दूर बैठ उसे ताकती रही, अपलक
सुलगती रही बिन आग, याद के साथ साथ !!

दरअसल -
वक़्त दिन तारीख नहीं होते एक दूसरे से जुदा
शब्द ढूँढ ही लेते रास्ता कागज़ पर उतरने का
यादें कभी बंजर नहीं होती जिंदगी के रेगिस्तान में !!

सु-मन

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

तब और अब









तब 


हल्का हल्का 

दर्द था 
छोटी छोटी 
ख़्वाहिशें थी ....

गहरा गहरा 

रिश्ता था 
महकी महकी 
आशाएं थी ..... 

भरा भरा 

दरिया था 
प्यासी प्यासी 
बारिशें थी ......














...अब 

अलग अलग 

रास्ता है 
भूली भूली 
यादें हैं .....

टूटा टूटा 

बन्धन है 
गुढ़ी गुढ़ी 
गांठें हैं .....

सूखा सूखा 

सावन है 
भरी भरी 
आँखें हैं ....... !!


सु..मन 

सोमवार, 2 जून 2014

बेआवाज़ ख़ामोशी











सब ख़ामोश है अब
लफ्ज़ भी
एहसास भी
बंद किताब की तरह .....

ख़ामोशी की सिलवटें
बढ़ रही
हर पन्ने पर
आहिस्ता-आहिस्ता......

बीच-
अब कुछ भी नहीं
सिवाय  
बेआवाज़ ख़ामोशी के......

हाँ, बेढब यादें जिल्द सी
अब तक किताब को समेटे है शायद !!


सु..मन

सोमवार, 12 जुलाई 2010

भूली याद




















बढ़ गया दायरा जब तन्हाई का या रब
तू भी बदल गया एक बेवफा की तरह ;

डाला था हमने खुद को तेरी पनाह में
ठूकरा दिया तूने भी एक इंसान की तरह ;

क्या करें शिकवा क्या शिकायत किसी से
तू तन्हा छोड गया एक मुसाफिर की तरह ;

रूह-ए-सकूं मांगा था तेरी निगेहबानी में
दगा दिया तूने भी एक अजनबी की तरह ;

अब तो है शब-ए-गम , तड़प और टूटे ख़ाब
तू आ जाता है कभी सामने एक याद की तरह !!

              ................................
                                                             सु..मन 




अर्पित 'सुमन'--------नई चेतना

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

याद आता है.............

याद आता है.......


याद आता है
वो माँ का लोरी सुनाना
कल्पना के घोड़े पर
परियों के लोक ले जाना
चुपके से दबे पांव
नींद का आ जाना
सपनों की दुनियाँ में
बस खो जाना ...खो जाना...खो जाना..................

याद आता है
वो दोस्तों संग खेलना
झूले पर बैठ कर
हवा से बातें करना
कोमल उन्मुक्त मन में
इच्छाओं की उड़ान भरना
बस उड़ते जाना...उड़ते जाना...उड़ते जाना.............

याद आता है
वो यौवन का अल्हड़पन
सावन की फुहारें
वो महका बसंत
समेट लेना आँचल में
कई रुमानी ख़ाब
झूमना फिज़ाओं संग
बस झूमते जाना...झूमते जाना...झूमते जाना............

याद आता है
वो हर खुशनुमा पल
बस याद आता है..............
                           याद आता है.............
                                               याद आता है................!!



सु..मन 

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

यूं ही कभी !

कुछ पल दोस्ती के नाम

यूं ही कभी

इन बन्द आखों में

आती है सामने

कुछ बीती यादें

कुछ जीये हुए पल;

वो हंसना वो रोना

उठकर रातों को

बातें सुनाना

याद है आता

अब इन दिनों में

जीकर जो गुजर गया

बीते हुए दिनों में;

हर पल दिल में

कसक सी उठती है

काश होते पास वो

जिनसे अब दूरी है;

हर घड़ी मन में

ख़याल ये आता है

गर होता है बिछड़ना

खुदा क्यों मिलाता है;

हर पल उनकी यादों में

अब हम तड़पते हैं

पर शायद सभी मिलकर

यूं ही बिछड़ते हैं...............!!


सु..मन 
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