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बुधवार, 12 अगस्त 2020

जानते हो कनु !


















जानते हो कनु ! 
कल रात मैंने नहीं किया तुम्हारा इंतज़ार
और सो गयी सरहाने पर सिर रख कर
बिना तुम्हारा स्वागत किये ।

सारा दिन तुम्हारे नाम का उपवास किये
हर धड़कन पर तेरी मुरली का संगीत लिए
प्रतिपल विस्मृत सी तुम्हारी याद में
करती रही अपने हर काम ।

जाने क्या हुआ कनु !
जिस पहर जागा रहा सारा जगत
तुम्हारी जन्म की मंगल वेला में
वहीं अकल्पित मैं-
आँखें मूँद क्यों बैठ गयी तुम्हारे ख़याल में
निशीथ में तुम्हारे आगमन से ठीक पहले ।

तुम बाँह पसारे अठखेलियाँ करते
आये और समा गये हर मूरत, हर मन में
और मैं तुम्हारे ख़यालों की दुनिया में
अवचेतन मन से करती रही तुम्हारा सुमिरन ।

तुमने उस घड़ी मुझे क्यों नहीं जगाया कनु ?
सारे दिन तुम्हारे आगमन को लालायित मैं
क्यों अपात्र रही उस पूजा अर्पण में ....


पर जानते हो कनु !

इस क्षणभंगुर देह से परे
मेरी आत्मा में व्याप्त तुम
कैसे पृथक हो सकते हो मुझसे..
पूजा विधि से अनभिज्ञ मैं
तिरोहित कर अपना सर्वस्व तेरे चरणों में
उस पावन घड़ी भी तुममें समाहित थी ।


भाव की प्यास से तृप्त मेरे एकल योगनिद्रा स्वामी !
निद्रा के अवचेतन मन से समर्पित भाव तुमको स्वीकार्य हो !!

सु-मन



जन्मदिन मुबारक कान्हा !!

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

प्रेम (अपरिभाषित)


प्रेम इतना विशाल होता है कि जिसको परिभाषित करना नामुमकिन है बिलकुल वैसे....जैसे इस असीमित आकाश को सीमा देना | ईश्वर की सबसे सुंदर कृति इन्सान और इंसान में धड़कता उसका कोमल ह्रदय ..उसमें बहता भावनाओं का दरिया ....और उन भावनाओं से उपजती प्रेम की अभिव्यक्ति......

प्रेम (अपरिभाषित)

सोचा लिखूं... मैं भी
प्रेम की परिभाषा
परिभाषित कर दूँ प्रेम
आज इस प्रेम दिवस पर  
पर ...
मेरे लिए
नहीं हैं प्रेम
मात्र एक दिन की सौगात
न ही
अभिव्यक्ति एक दिन की
मेरे लिए
हर पल है प्रेम
जिसमे सुनती हूँ
मौन तुम्हारा
देखती हूँ अपनी आँखों में
तुम्हारे कुछ बुने सपने
लफ़्ज़ों को देती हूँ
आकार तुम्हारा
सृजित करती हूँ
अपने भीतर
एक नई कोंपल
तुम्हारे नेह की
और
‘मन’ के दर्पण में
देखती हूँ
हर पल खिलता
एक ‘सु-मन’ !!




सु-मन 
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