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शनिवार, 4 अप्रैल 2020

इंडिया लॉक डाउन डायरी ~ Day 11(ऑफिस फुलवारी)

आज बहुत दिन ऑफिस जाना हुआ 
















आज मिली फिर तुमसे
बैठी कुछ देर तुम संग
की दो चार बातें 
खूब चहक रही तुम 
लाल पीले फूलों संग 
बोटल-ब्रश भी
झूम रहा था लाली से 
गुलाब और चमेली
महक रहे थे शान से
नहीं था भय तुम्हें 
किसी संक्रमण का
प्रकृति को खुद में समाये
ले रही थी जीवंत साँसे
दे रही थी मानव को 
जीवन का असली सन्देश |

मेरी फुलवारी !
कि तुम मेरे जीवंत होने का साक्ष्य हो ||


सु-मन 


पढ़े ~ Day 10

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

जिंदगी मुबारक !

रहें ना रहें हम , महका करेंगे 
बन के कली बन के सबा बागे वफ़ा में ..
सर्दियों में क्यारी की शुरुआत 

आखिर मेहनत रंग ला ही गई |
बात कई महीनों पहले की है | हमारे ऑफिस के प्रांगण में सामने की तरफ खाली पड़ी जगह थी जिसमें मैं पौधे लगाना चाहती थी पर सभी द्वारा मेरी बात नज़रअंदाज़ की जाती रही | मैंने कुदाली खरीद कर खुद क्यारी बनाई और इधर उधर से लकड़ी लाकर बाड़ लगा दिया क्योंकि आवारा पशु यहाँ वहां घूमते रहते और पौधों को तोड़ देते | पास के एक घर में काफी पौधे लगे थे उनसे मांग कर लगाये | रोज़ पानी देती | ऑफिस के लोग जो ज्यादातर गाँव से आते हैं मुझे देख कर हंस कर कहते कि सुमन हमारे खेतों में भी काम कर जाना | कुछ लोगों के अंदाज़ में व्यंग होता कुछ के मजाक |
Temporary कुदाली 

एक बार शायद रात को कोई गाय वगैरा आई होगी उसने एक तरफ से बाड़ का डंडा तोड़ दिया , मैं सुबह उसे ठीक कर रही थी कि हमारे सर ( खंड विकास अधिकारी ) आये उन्होंने खुद उसे ठीक करने में मेरी मदद की, मैंने उनसे रेलिंग लगवाने के लिए बोला लेकिन बजट कहाँ से आएगा ये कह बात टल गयी | धीरे धीरे सभी लोग इस क्यारी की रखवाली करने लगे | जो लोग हंसते थे उन्होंने ने ही गाँव से पौधे लाकर मुझे दिए मैं कहती आप लगा दो तो बोलते नहीं, आपकी क्यारी है आप ही लगाओगे | मैं खुश थी लोगों का नजरिया बदल रहा था |
कुछ वक्त पहले 
ऐसे ही एक दिन क्यारी के बीच में जो बिजली का खम्बा है उसको सीधा करने के लिए बिजली कर्मचारी आये , क्यारी और पौधे खराब हो गए तभी सर बाहर आये तो साथ में खड़े एक कलीग बोलते - सुमन की क्यारी सारी खराब हो गई | सर अच्छे मूड में थे कहा ..चलो लिखो ऑफिस नोट, मैं अप्रूव करता हूँ | मैं तो उछल पड़ी , उसी वक़्त ऑफिस नोट लिख कर अप्रूव हो गया और आज सभी लोग मुझे मुबारक दे रहे और नर्सरी से पेड़ और पौधे भी आ रहे | मैं बहुत खुश हूँ मेरी क्यारी अपना वजूद पा गयी |


काम शुरू 

अब खूब फूल खिलेंगे 

कभी कभी सोचती हूँ इसमे कुछ भी मेरा नहीं है फिर क्यूँ इतनी जिद और मेहनत की , कल को इस ऑफिस में रहूँ ना रहूँ क्या पता | ये क्यारी बनाने का मकसद बस इतना था कि अगर अपने चारों ओर अच्छा देखने को मिले तो मन भी अच्छा रहता है वरना और भी काम है जिन्दगी में पेड़ पौधे लगाने के सिवा ;) 

इस क्यारी को नई जिन्दगी मुबारक ! इस बरस इस क्यारी में खूब सुमन महकेंगे और इस सु-मन का मन बाग बाग हो जायेगा |


सु-मन 

मंगलवार, 1 मार्च 2016

सोच की हद















हर बार सोचती हूँ
एक हद में सिमट जाऊँ
कर लूँ अपनी सोच को
एक अँधेरी कोठरी में बंद
दुनिया की रवायत संग
जीने लगूं एक बेनाम जिंदगी
बांध अपने पैरों में बेड़ियाँ
चल दूँ राह पर उस तरफ
जिस तरफ ले जाना चाहे कोई
दिल दिमाग के हर दरवाजे पर
लगा दूँ एक जंग लगा ताला
मन के वांछित कारावास से
कर दूँ निर्वासित अपना वजूद !
*****
सोच से हदें तय हुई या हदों से सोच ..कौन जाने ...जाना तो बस इतना कि हदों की खूंटी पर टंगे रहते हैं वजूद के लिबास और सोच के ज़िस्म पर पहनाई जाती हैं कुछ बेड़ियाँ !!



सु-मन 

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