शनिवार, 4 सितंबर 2010

ज़ख्म










ज़ख्म

बन्द हैं चौखट के उस पार
अतीत की कोठरी में
पलों के रत्न जड़ित
आभूषण
एक दबी सी आहट
सुनाती
एक दीर्घ गूंज
समय चलता
अपनी उलटी चाल
घिरता कल्पनाओं का लोक
लम्हों को परिचालित करता
अपने अक्ष पर
प्रतिध्वनित हो उठती
अनछुई छुअन
सरिता बन जाता
समुद्र का ठहराव
हरित हो उठती
पतझड़ की डालियाँ
लघु चिंतन में
सिमट जाता
पूरा स्वरूप
बन जाता
फिर......
एक रेत का महल
खुशियों का लबादा ओढ़े
दस्तक देता प्रलय
ढेर बन गए महल में
दब जाती
वो गूंज
रत्नों पर फन फैलाए
समय का नाग
डस लेता
देता एक सुलगता ज़ख्म
रिसता है जो
शाम ढले
उस चौखट को देखकर..........!!

                                                               सु..मन 






22 टिप्‍पणियां:

  1. सुमन जी
    भावनाओं के कितने मोती जड़े होते हैं आपकी रचना में.

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  2. अतीत की कोठरी में क्या क्या भरा है सुमन जी,
    सच में अंतर्द्वंध है ये..........
    शब्दों का सामंजस्य बहुत अच्छे ढंग से sthapit किया है.....बहुत उम्दा रचना हुई है....

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  3. चौखट के आगे रिश्ता दर्द .... मन तक आ गया

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  4. बहुत खूबसूरती से जज्बातों को रत्न पहना दिए हैं ...खूबसूरत

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  5. suman ji aapke bhaw thekha vyang karte hai !! bahut achha .... mere blog par bhi swagat hai !!


    Jai HO Mangalmay HO

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  6. अतीत की परछाइयाँ कुछ ऐसे ही एहसास कराती हैं.

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  7. सुन्दर अभिव्यक्ति---सच है--

    "..यादें क्या हैं
    मन की लाइब्रेरी में संजो कर रखी गईं
    पुस्तकें, पत्रिकाएं व संदर्भ ग्रन्थ- या सी डी-
    जिन्हें हम जब चाहे
    आल्मारी से निकालकर, या-
    कम्प्यूटर में लोड करके,
    पढ लेटे हैं ,और जी लेते हैं, उन-
    भूले-बिसरे क्षणों को।"----काव्य-दूत से.

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  8. काफी सुन्दर रचनाये हैं आपकी ....ब्लॉग अच्छा लगा ......हिंदी के साथ ऐसी रचनाये कम देखने को मिलती हैं ......शुभकामनाये

    कभी फुरसत मिले तो हमारे ब्लॉग पर भी आयिए -

    http://jazbaattheemotions.blogspot.com/
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  9. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 7- 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  10. bahoot hi gahre jakham ki peeda hai...bhahoot khoob

    upendra ( wwww.srijanshikhar.blogspot.com )

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  11. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ....
    अच्छी पंक्तिया सृजित की है आपने ........
    भाषा का सवाल सत्ता के साथ बदलता है.अंग्रेज़ी के साथ सत्ता की मौजूदगी हमेशा से रही है. उसे सुनाई ही अंग्रेज़ी पड़ती है और सत्ता चलाने के लिए उसे ज़रुरत भी अंग्रेज़ी की ही पड़ती है,
    हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं

    एक बार इसे जरुर पढ़े, आपको पसंद आएगा :-
    (प्यारी सीता, मैं यहाँ खुश हूँ, आशा है तू भी ठीक होगी .....)
    http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_14.html

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  12. आपकी हर एक नई रचना पहले से अधिक परिपक्व दिखती है...

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