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शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

तुम संग चलूँगी..........















तुम्हें याद है ना
मैं कहती थी तुमसे
जीवन के हर पथ पर
तुम संग चलूँगी......
तो तुम
मेरी इन आँखों में
गहरे उतर कर
बस हंस देते थे
( उस हंसी का अर्थ मैं आज समझ पाई हूँ )
और
फिर मुड़कर
देखने लगते
सूर्य के डूबने से
उभर आई लाली को
और मैं
बस तुम्हारे काँधे पर
सर रखकर
स्वप्निल राह पर
चलने लगती
तुम संग..........













फिर छूटे कुछ पत्ते
समय की डाली से
और बस रह गया
उस राह का धुंधलका
और
मेरी बोझिल आँखें
बहती हैं जिससे
अब
गर्त की बौझारें
उन्हें अपनी अंजुरी में
भर कर
चल देती हूँ
उसी धुंधली राह पर
अपनी अक्षय सोच लिए
कि
जीवन के हर पथ पर
तुम संग चलूँगी...........
तुम संग चलूँगी...........


                                  सुमन मीत