बुधवार, 20 जनवरी 2010

"प्रकृति के रंग"

शाम ढल आई

मेघ की गहराई

नीर बन आई

आसमा की तन्हाई

न किसे भी नज़र आई ;


रातभर ऐसे बरसे मेघ

सींचा हर कोना व खेत

न जाना कोई ये भेद

किसने खेला है ये खेल ;


प्रभात में खिला उजला रूप

धुंध से निकली किरणों मे धूप

खेत में महका बसंत भरपूर

अम्बर आसमानी दिखा मगरूर ;



पंछियों से उड़े मतवाले पतंग

डोर को थामे मन मस्त मलंग

मुग्ध हूँ देख “प्रकृति के रंग”

कैसे भीगी रात की तरंग

ले आई है रश्मि की उमंग !!






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सु..मन 

1 टिप्पणी:

  1. Aapki rachnayen padh kar man jhoom uthta hai.
    Maa Saraswati aap par isi tarh meherban rahen aur aap apni rachnayen yahan likhti rahen.

    उत्तर देंहटाएं