सोमवार, 19 अप्रैल 2010

स्वप्निल राह

जीवन की राहों में कई बार कदम कुछ ऐसी राह पकड़ लेते हैं जिसकी कोई मंजिल नहीं होती या यूं कहो कि मंजिल सपना बन जाती है और वो राह स्वप्निल ।






स्वप्निल राह

जीवन की सच्चाई से
अनभिज्ञ वो
बढ़ती जा रही थी
स्वप्निल रास्तों के गांव
लेकर विचारों की छांव
कदम पर आई ठोकर को
विश्वास के पत्ते से सहलाती
बस बढ़ती जा रही थी
बेखौफ वो जज़्बाती
मंजिल से दूरी
लगती अब कम थी
आँखें भी खुशी से
हो गई नम थी
पर.....
एक पल में मानो
सब कुछ बिखर गया
तिनका-तिनका कर घरौंदा
अब तो टूट गया
उसकी ये राह
सिर्फ स्वप्निल थी
जीवन की सच्चाई नहीं
मन की भटकन थी
ये जानती है वो
ये जानती है वो
कि स्वप्निल राहों की
दिशाएं नहीं होती
गर न होता
ये नाजुक मन
न होते अरमान
न ही आशाएं होती
न होते अरमान  
                  न ही आशाएं होती ...............




                                 सु..मन 


26 टिप्‍पणियां:

  1. mere humnaam raste kisi ko pareshan karenge ....aisa socha to nahi tha..par aap ki nazm to kehti hai ki koi hua hai .....badhiya prastuti..

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  2. स्वपनिल राहें....भावपूर्ण रचना. बहुत बढ़िया.

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  3. स्वप्निल राहों की दिशाएँ नही होती

    दिशाहीन स्वप्नो को महज़ एक दिशा देना है
    मंजिल पा ही लेंगे

    बेहतरीन रचना

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  4. इंसान को स्वप्न अक्सर धोखा दे जाते हैं ! अच्छी रचना !

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  5. भावपूर्ण रचना ,सच है जब मन ही भटक जाए तो शायद सही ग़लत का अंतर समझ में नहीं आता और मनुष्य सपने को सच समझ लेता है,जिस का टूटना उसे दुखी कर जाता है

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  6. स्वप्निल राहों की दिशाएं नहीं होतीं.....बहुत अलग सी सोच....सुन्दर प्रस्तुति

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  7. bahut khubsurti se likha hai aapne..
    pehli baar aapke blog ki taraf ka rookh kiya hai..
    aapko padhkar achha laga..
    aksar aata rahoonga.....
    regards..
    http://i555.blogspot.com/

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  8. जीवन की तल्ख़ हकीकत से टकराकर सपने अक्सर टूट जाते हैं...बहुत भावपूर्ण रचना है आपकी...बधाई.
    आपके ब्लॉग पर पहली बार ही आना हुआ है, इस की साज सज्जा से बहुत प्रभावित हुआ हूँ..आपका चित्र चयन भी लाजवाब है...
    नीरज

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  9. ये नाजुक मन
    न होते अरमान
    न ही आशाएं होती
    न होते अरमान
    न ही आशाएं होती ............


    bahut khub


    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

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  10. स्वप्निल राहों की...दिशाएं नहीं होती
    गर न होता...ये नाजुक मन...न होते अरमान
    न ही आशाएं होती...न होते अरमान.. न ही आशाएं होती .
    लेखन की इस बुलंदी के लिये बहुत बहुत शुभकामनाएं

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  11. वाह !.....अछे भाव लिए हुए ....सुन्दर रचना

    http://athaah.blogspot.com/

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  12. सुन्दर भाव इन स्वप्निल पंक्तियों के ..बहुत खूब ..शुक्रिया सुमन जी

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  13. अगर स्वप्न न हों ... स्वप्निल राहे न हों तो जीवन आसान नही होगा ... ये स्वप्न ही तो उमंग बरते हैं जीवन में ...

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  14. कल्पना और परिक्ल्पना के इस जीवन में इन्सान कई घरोंदे बनत है! कुछ टूट जाते हैम, कुछ बिखर जाते हैं ! यही जीवन है !

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  15. उत्कृष्ट भाव....अच्छी प्रस्तुति
    ========================
    डॉ.चन्द्रकुमार जैन

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